BY
Yoganand Shrivastava
PSLV-C62 मिशन से मिले अहम सबक
ISRO : हाल ही में PSLV-C62 मिशन को तकनीकी कारणों से असफल घोषित किया गया। इसरो के वैज्ञानिक डॉ. एस. वेंकटेश्वर शर्मा ने स्पष्ट किया कि यह 2026 का पहला मिशन था और इसमें चार चरणों वाले पीएसएलवी रॉकेट का उपयोग किया गया था। 44.4 मीटर ऊंचा और लगभग 260 टन वजनी यह प्रक्षेपण यान सॉलिड और लिक्विड प्रणालियों के संयोजन पर आधारित था। मिशन भले सफल न हो पाया, लेकिन इससे भविष्य की उड़ानों के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी अनुभव प्राप्त हुआ है।

EOS-N1 उपग्रह और पीएसएलवी की विश्वसनीयता
ISRO इस मिशन का मुख्य पेलोड EOS-N1 (अन्वेषा) उपग्रह था, जिसे इसरो और डीआरडीओ के संयुक्त सहयोग से विकसित किया गया। यह उपग्रह उच्च गुणवत्ता मानचित्रण, पर्यावरण निगरानी और रणनीतिक जरूरतों के लिए डिजाइन किया गया था। डॉ. शर्मा के अनुसार, उपग्रह की नियंत्रण, विद्युत और मार्गदर्शन प्रणाली इसरो ने विकसित की, जबकि विशेष पेलोड डीआरडीओ ने निजी कंपनियों के साथ मिलकर तैयार किया। उन्होंने यह भी बताया कि पीएसएलवी अब तक मंगलयान और चंद्रयान-1 जैसे ऐतिहासिक अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुका है और इसे भारत के सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यानों में गिना जाता है। आने वाले वर्षों में इसके उत्पादन में निजी क्षेत्र की भूमिका और बढ़ेगी।

गगनयान, मानव मिशन और भारत का स्पेस स्टेशन
ISRO भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए डॉ. शर्मा ने कहा कि गगनयान कार्यक्रम के तहत 2026 की शुरुआत में पहला मानवरहित अंतरिक्ष मिशन भेजने का लक्ष्य है। इसके बाद तीन सफल मानवरहित उड़ानों के उपरांत 2027 में भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। इसके लिए LVM3 रॉकेट का विशेष मानव परीक्षण किया जा रहा है, जिसमें उच्च स्तर की सुरक्षा और आपातकालीन प्रणालियां शामिल हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत 2035 तक अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की दिशा में कार्य कर रहा है, जिससे देश अंतरिक्ष अनुसंधान और मानव मिशनों में नई ऊंचाइयों को छू सकेगा।

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