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1 जून: भोपाल की असली आज़ादी का दिन, जब नवाबी शासन का हुआ अंत

BY: Yoganand Shrivastva

भोपाल/ मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के इतिहास में 1 जून का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही वह तारीख है जब यह ऐतिहासिक शहर 226 वर्षों तक चले नवाबी शासन से मुक्त होकर पूरी तरह भारत गणराज्य का अंग बना। इसी ऐतिहासिक उपलब्धि को सम्मान देने के लिए राज्य सरकार हर वर्ष “भोपाल गौरव दिवस” के रूप में इस दिन को मनाती है।

भारत आज़ाद हुआ, पर भोपाल नहीं

भारत ने 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ी हुकूमत से मुक्ति पाई, लेकिन उस समय देश में 500 से अधिक रियासतें थीं जिनका भारत में विलय किया जाना बाकी था। भोपाल भी उन्हीं में से एक था। भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान ने भारत में शामिल होने के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर तो कर दिए, परंतु एक “स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट” के तहत वे राज्य के शासक बने रहे।

भारत सरकार ने नवाब से एक लोकतांत्रिक प्रतिनिधि सरकार बनाने को कहा। इसके तहत चतुर नारायण मालवीय को प्रधानमंत्री बनाया गया और कुछ अन्य नेताओं को सरकार में शामिल किया गया। लेकिन जनता ने सवाल उठाने शुरू कर दिए—जब पूरे देश में लोकतंत्र लागू हो चुका था, तो भोपाल अब भी नवाबी व्यवस्था क्यों झेल रहा है?

1949 में भड़का आंदोलन

भोपाल में जनता की असहमति धीरे-धीरे एक विलीनीकरण आंदोलन के रूप में सामने आई। यह आंदोलन 6 जनवरी 1949 से शुरू होकर 30 जनवरी तक चला। इसकी अगुवाई रतन कुमार गुप्ता ने की और इसे “नई राह” नामक अख़बार से समर्थन मिला। सरकार ने इस अख़बार के दफ्तर को सील कर दिया, लेकिन आंदोलन ने भूमिगत रूप से गति पकड़ ली।

आंदोलन का प्रसार होशंगाबाद, रायसेन, सीहोर और इछावर जैसे इलाकों तक पहुंचा। रायसेन जिले के बोरास गांव में जब आंदोलनकारियों ने तिरंगा फहराया, तो पुलिस ने गोलीबारी की, जिसमें चार युवा शहीद हो गए। यह घटना पूरे देश में गूंज उठी।

पटेल की दृढ़ता और नवाब का झुकना

इस स्थिति को देखते हुए भारत के उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 24 जनवरी को अपने सचिव वी.पी. मेनन को भोपाल भेजा। अंततः नवाब को झुकना पड़ा और 30 अप्रैल 1949 को भारत सरकार व नवाब के बीच एक समझौता हुआ। इसके तहत तय हुआ कि 1 जून 1949 से भोपाल की प्रशासनिक बागडोर भारत सरकार के हाथ में होगी।

इस दिन एनबी बनर्जी, भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भोपाल पहुंचे और नवाब से शासन का नियंत्रण अपने हाथ में लिया। इसके साथ ही भोपाल में नवाबी युग का पटाक्षेप हुआ और यह शहर भारतीय गणराज्य का अभिन्न हिस्सा बन गया।

गौरव दिवस की शुरुआत

भोपाल को मिली इस देर से आई, लेकिन निर्णायक आज़ादी की स्मृति को जीवित रखने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 1 जून को “भोपाल गौरव दिवस” के रूप में मनाने की शुरुआत की। साल 2022 और 2023 में इस मौके पर कई सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। हालांकि 2024 में चुनावी आचार संहिता के कारण समारोह नहीं हो सका।

आने वाली पीढ़ियों के लिए सबक

भोपाल गौरव दिवस का उद्देश्य केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को यह बताना है कि स्वतंत्रता केवल 15 अगस्त 1947 को ही नहीं मिली थी। देश के कुछ हिस्सों को लोकतांत्रिक भारत का हिस्सा बनने के लिए और भी लंबा संघर्ष करना पड़ा था। भोपाल की जनता ने उस संघर्ष को जिया, आंदोलन किया, बलिदान दिए और फिर जाकर अपने शहर को भारत का हिस्सा बनाया।

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