Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को छह महीने से अधिक की गर्भावस्था को समाप्त करने की अनुमति मांगने वाली एक महिला की याचिका पर सुनवाई हुई। महिला ने पति के साथ वैवाहिक विवाद और ससुराल पक्ष की ओर से कथित प्रताड़ना का हवाला देते हुए गर्भपात कराने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, उसके पति ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि गर्भ में पल रहे बच्चे पर उसका भी अधिकार है और वह बच्चे के जन्म के बाद उसकी देखभाल करने के लिए तैयार है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने गर्भपात की अनुमति देने से जुड़े कानूनी और सामाजिक पहलुओं पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि बलात्कार, यौन उत्पीड़न या भ्रूण में गंभीर चिकित्सकीय समस्या जैसी परिस्थितियों में गर्भपात की अनुमति पर विचार किया जा सकता है, लेकिन मौजूदा मामला इन परिस्थितियों से अलग है। अदालत ने यह भी सवाल किया कि क्या पति और ससुराल वालों के साथ विवाद के आधार पर छह महीने से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है।
Supreme Court: पति और ससुराल से विवाद के बाद महिला ने मांगी गर्भपात की अनुमति
मामले के मुताबिक, महिला अपने पति के साथ चल रहे वैवाहिक विवाद के कारण गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती है। उसने अदालत से छह महीने से अधिक समय की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी। महिला का कहना है कि वह अब इस रिश्ते को आगे नहीं बढ़ाना चाहती और तलाक लेकर अलग जीवन शुरू करना चाहती है।
वहीं, महिला के पति ने उसकी याचिका का विरोध किया। पति का कहना है कि वह बच्चे के जन्म के बाद उसकी जिम्मेदारी उठाने और देखभाल करने के लिए तैयार है। उसने अदालत से अनुरोध किया कि गर्भपात की अनुमति नहीं दी जाए। इस तरह मामले में एक तरफ महिला की गर्भावस्था समाप्त करने की इच्छा है, जबकि दूसरी तरफ पति अजन्मे बच्चे के जन्म और उसकी परवरिश के पक्ष में है।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- पिता के अधिकारों का क्या होगा?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मामले के अलग-अलग पहलुओं पर विचार किया। न्यायाधीशों ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मतभेद और विवाद होना अलग बात है, लेकिन केवल वैवाहिक अनबन के आधार पर छह महीने से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने का सवाल गंभीर है।
पीठ ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य और पिता की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने महिला से कहा कि वह गर्भपात की मांग पर दोबारा विचार करे। न्यायाधीशों ने यह सवाल भी उठाया कि यदि वैवाहिक विवाद के कारण गर्भपात की अनुमति दी जाने लगे, तो इसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा और ऐसे मामलों में पिता के अधिकारों को किस तरह देखा जाएगा।
Supreme Court: रेप या भ्रूण में समस्या होने पर अलग हो सकते हैं हालात
सुनवाई के दौरान अदालत ने गर्भपात से जुड़े कुछ विशेष हालात का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि बलात्कार या यौन उत्पीड़न के मामलों में गर्भपात की अनुमति देने पर विचार किया जा सकता है। इसी तरह यदि भ्रूण में कोई गंभीर चिकित्सकीय समस्या सामने आती है, तो मामला अलग हो सकता है।
हालांकि, अदालत के सामने मौजूद याचिका में महिला की मुख्य दलील पति और ससुराल पक्ष के साथ विवाद तथा कथित प्रताड़ना से जुड़ी है। पीठ ने इसी अंतर को रेखांकित करते हुए कहा कि यह मामला उन परिस्थितियों जैसा नहीं है, जिनमें गर्भपात की अनुमति पर सामान्य रूप से विचार किया जाता है। अदालत के सामने गर्भावस्था की अवधि, भ्रूण की स्थिति और महिला की परिस्थितियों से जुड़े पहलू भी महत्वपूर्ण हैं।
Supreme Court: महिला बोली- गर्भपात कराकर तलाक लेना चाहती हूं
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता महिला ने स्पष्ट किया कि वह गर्भावस्था जारी नहीं रखना चाहती। उसका कहना था कि वह गर्भपात कराकर अपने पति से तलाक लेना चाहती है और वैवाहिक संबंध समाप्त करना चाहती है।
दूसरी ओर, पति ने अदालत को बताया कि वह बच्चे के जन्म के बाद उसे अपने पास रखने और उसकी देखभाल करने के लिए तैयार है। पति का पक्ष है कि वैवाहिक रिश्ते में विवाद होने के बावजूद बच्चे का भविष्य अलग विषय है। इसी आधार पर उसने गर्भपात की अनुमति देने का विरोध किया। दोनों पक्षों की दलीलों के बाद अदालत ने मामले को सुलह की संभावना के साथ देखने की कोशिश की।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने महिला से हलफनामा दाखिल करने को कहा
सुनवाई के दौरान पति की ओर से महिला के चरित्र को लेकर लगाए गए आरोपों का मुद्दा भी सामने आया। इस पर पीठ ने महिला से कहा कि यदि वह वैवाहिक विवाद को सुलझाने की दिशा में पहला कदम उठाना चाहती है, तो वह अपने आरोप वापस लेने के संबंध में अदालत में हलफनामा दाखिल कर सकती है।
अदालत ने मामले में दोनों पक्षों के बीच सुलह की संभावना पर भी विचार किया। पीठ ने महिला को अपनी मांग पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया। फिलहाल गर्भपात की अनुमति को लेकर अंतिम फैसला नहीं सुनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए बुधवार की तारीख तय की है। अब अगली सुनवाई में महिला और उसके पति का पक्ष सुनने के बाद अदालत आगे का रुख स्पष्ट कर सकती है।
Supreme Court: छह महीने से अधिक की गर्भावस्था में गर्भपात का मामला क्यों है अहम?
छह महीने से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने का मामला चिकित्सकीय और कानूनी दोनों दृष्टिकोण से संवेदनशील होता है। भारत में गर्भपात से जुड़े मामलों का नियमन मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत होता है। गर्भावस्था की अवधि, महिला की स्वास्थ्य स्थिति और कानून में निर्धारित परिस्थितियों के आधार पर गर्भपात की अनुमति से जुड़े फैसले लिए जाते हैं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने महिला की इच्छा, वैवाहिक विवाद, भ्रूण की स्थिति और पति की ओर से बच्चे की जिम्मेदारी लेने की इच्छा जैसे कई पहलू हैं। इसलिए अदालत की अगली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, अंतिम निर्णय आने तक गर्भपात की अनुमति को लेकर कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।


