पिता की जगह इंजीनियर बेटे की हिरासत मामले में नया मोड़, सुनवाई से पहले याचिका वापस लेने की अर्जी

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BY: Yoganand Shrivastva

इंदौर: पॉक्सो एक्ट के एक मामले में आरोपी पिता की बजाय उसके इंजीनियर बेटे को अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। इस प्रकरण में हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई से ठीक एक दिन पहले याचिकाकर्ता की ओर से याचिका वापस लेने और वकील बदलने का आवेदन प्रस्तुत किया गया है।

इस मामले में नौ दिसंबर को हाईकोर्ट में पुलिस को अपनी रिपोर्ट पेश करनी थी, जिसमें यह स्पष्ट किया जाना था कि संबंधित पुलिस अधिकारियों पर अब तक क्या कार्रवाई की गई। हालांकि याचिका वापस लेने के आवेदन के बाद भी यह माना जा रहा है कि पुलिस को कोर्ट के समक्ष जवाब देना ही होगा।

याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता नीरज सोनी ने बताया कि इंजीनियर राजेंद्र दुबे की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट जो निर्देश पहले ही दे चुका है, उसके तहत पुलिस को अपनी रिपोर्ट पेश करनी अनिवार्य है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिका वापस लेने या वकील बदलने की जानकारी उन्हें नहीं है। अब आगे की कार्रवाई राज्य सरकार और न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगी।

हाईकोर्ट ने माना था मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
चार दिसंबर को हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को नागरिक के मौलिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताया था। कोर्ट ने चंदन नगर थाना प्रभारी इंद्रमणि पटेल की भूमिका पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस कमिश्नर को संबंधित पुलिस कर्मियों पर आपराधिक मामला दर्ज करने के निर्देश दिए थे।

कोर्ट के अनुसार, इंजीनियर युवक को थाने में करीब तीस घंटे तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उसे हथकड़ी भी पहनाई गई, जबकि वह इस अपराध से पूरी तरह निर्दोष था।

पूरा मामला क्या है
चंदन नगर थाना क्षेत्र में रियल एस्टेट कारोबारी संजय दुबे के खिलाफ नाबालिग से दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था। केस दर्ज होने के चौदह दिन बाद भी जब पुलिस आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर पाई, तो छब्बीस नवंबर को पुलिस ने उसके बेटे इंजीनियर राजेंद्र दुबे को सैलून से उठा लिया और करीब तीस घंटे तक थाने में बैठाकर रखा। इस दौरान उसे हथकड़ी भी पहनाई गई।

इस अवैध कार्रवाई के खिलाफ राजेंद्र के साले आकाश तिवारी ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि राजेंद्र के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला दर्ज नहीं है, इसके बावजूद उसे हिरासत में लिया गया। याचिका की जानकारी मिलते ही पुलिस ने राजेंद्र को रिहा कर दिया था।

हाईकोर्ट ने इस मामले में थाना प्रभारी को छब्बीस और सत्ताईस नवंबर के तीस घंटे के सीसीटीवी फुटेज के साथ कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया था। हालांकि चार दिसंबर को थाना प्रभारी कोर्ट में उपस्थित तो हुए, लेकिन सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत नहीं कर सके।

इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं। साथ ही पुलिस कमिश्नर से यह भी पूछा गया था कि संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है।

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