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देशभक्ति की अलख जगाने वाली एक आवाज खामोश हुई, मनोज कुमार का 87 वर्ष की उम्र में निधन

Manoj Kumar died at the age of 87

5 अप्रैल को मुम्बई के पवन हंस में होगा अंतिम संस्कार, बॉलीवुड में शोक की लहर

BY: Vijay Nandan

आज हम एक ऐसे कलाकार को श्रद्धांजलि दे रहे हैं..जिनकी छवि सिर्फ़ पर्दे पर ही नहीं, बल्कि हर हिंदुस्तानी के दिल में ‘भारत कुमार’ के नाम से बसी रही। वो एक अभिनेता थे, निर्देशक थे, लेकिन उससे कहीं बढ़कर एक सच्चे देशभक्त थे… हम बात कर रहे हैं मनोज कुमार जी की, जिनका 87 वर्ष की उम्र में आज मुंबई में निधन हो गया। उनकी फिल्मों में देश की मिट्टी की खुशबू होती थी, किसानों का दर्द, जवानों की वीरता और आम आदमी की लड़ाई.. और ये सब कुछ बड़ी सादगी से परदे पर उतारने का नाम था मनोज कुमार। चलिए, आज उनकी ज़िंदगी के उन सुनहरे पलों को याद करते हैं, जिनकी वजह से उन्होंने न सिर्फ सिनेमा में, बल्कि देश के इतिहास में भी अपनी एक खास जगह बनाई।

उपकार, पूरब-पश्चिम, क्रांति, रोटी-कपड़ा और मकान…इन फिल्मों से भारत माता की आत्मा को परदे पर ज़िंदा करने वाले ‘भारत कुमार’ अब हमारे बीच नहीं रहे। 87 साल की उम्र में मनोज कुमार ने अंतिम सांस ली, लेकिन वे अपने पीछे छोड़ गए हैं देशभक्ति, संघर्ष और कला की एक पूरी विरासत। आइए जानते हैं उनके जीवन की पूरी कहानी।”

अविभाजत हिंदुस्तान अब के पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था जन्म

मनोज कुमार का असली नाम है, हरिकृष्ण गोस्वामी है, उनका जन्म 24 जुलाई 1937 में अविभाजत हिंदुस्तान अब के पाकिस्तान के एबटाबाद में हुआ था। 1947 के विभाजन के दौरान दंगों ने उनका बचपन छीन लिया। मां इलाज के लिए अस्पताल में थीं, लेकिन स्टाफ डर के मारे भाग गया। इलाज न मिलने से दो महीने के भाई की भी मौत हो गई। सिर्फ 10 साल के मनोज ने गुस्से में डॉक्टर्स और नर्सों की पिटाई तक कर दी थी। उस दर्द ने उन्हें अंदर से मजबूत बना दिया। परिवार ने पाकिस्तान छोड़ा और दिल्ली आकर शरण ली। दिल्ली में पढ़ाई के बाद वे फिल्मों का सपना लिए मुंबई पहुंचे। शुरुआत स्टूडियो में लाइट टेस्टिंग और सामान ढोने से हुई। तभी किस्मत ने साथ दिया और 1957 की फिल्म फैशन में मिला उन्हें एक छोटा सा रोल। लेकिन असली पहचान मिली ‘कांच की गुड़िया’ और ‘रेशमी रुमाल’ से। उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा.

उसके बाद उनकी एक फिल्म आई 1965 में ‘शहीद’ जिसमें उन्होंने भगत सिंह का किरदार निभाकर देश का दिल जीत लिया। ये फिल्म पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को बेहद पसंद आई थी। उन्होंने मनोज कुमार से कहा था  ‘जय जवान, जय किसान’ पर फिल्म बनाइए। इसके बाद ही भारत कुमार ने फिल्म उपकार बनाई..मनोज कुमार के बारे में कहा जाता है कि न कोई अनुभव, न फिल्म स्कूल में कोई शिक्षा ली, बस देशभक्ति का जज़्बा और आत्मविश्वास उनमें कूट-कूट कर भरा था। इसके दम पर उन्होंने फिल्म उपकार बनाई. 1967 के उस दौर में जब ये रिलीज हुई तो पूरे देश में छा गई।  फिल्म समीक्षक तरुण आदर्श की अक्सर मनोज कुमार से बातचीत होती थी.. तरुण बताते हैं कि मनोज कुमार ने फिल्म पूर्व और पश्चिम किस सोच के साथ बनाई थी..

‘पूरब-पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ से नई ‘क्रांति’

इसके बाद उन्होंने ‘पूरब-पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्में बनाई। क्रांति में उन्होंने अपने आदर्श दिलीप कुमार को भी निर्देशित किया। उन्होंने न सिर्फ निर्देशन किया, बल्कि अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक समस्याओं को भी फिल्मों में उकेरा। उनके निधन की खबर के सुन  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक व्यक्त किया और उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए x पर लिखा.. ‘महान अभिनेता और फिल्म निर्माता श्री मनोज कुमार जी के निधन से बहुत दुख हुआ। वह भारतीय सिनेमा के प्रतीक थे, जिन्हें विशेष रूप से उनकी देशभक्ति के उत्साह के लिए याद किया जाता था, जो उनकी फिल्मों में भी झलकता था। मनोज जी के कार्यों ने राष्ट्रीय गौरव की भावना को प्रज्वलित किया और यह पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।’

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी मनोज कुमार के निधन पर दुख जताया है और फिल्मों में उनके देशभक्ति से ओतप्रोत योगदान को याद किया.

वीओ. भारत कुमार के फिल्मी दुनिया में कई किस्से मशहूर हैं. कहा जाता है कि मनोज कुमार ने विलेन’ प्राण को ‘संत’ बना दिया था। ‘उपकार’ में प्राण को मलंग बाबा का किरदार दिया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। राज कपूर के साथ उनकी दोस्ती भी खूब मशहूर थी। राज कपूर उन्हें कहते थे, ‘डायरेक्शन छोड़ दो मनोज, ये सबके बस की बात नहीं। लेकिन ‘उपकार’ हिट होते ही राजकपूर बोले, ‘अब मुझसे मुकाबला करने के लिए तुम आ गए हो। ऐसा भी कहा जाता है कि जब ‘मेरा नाम जोकर’ फ्लॉप हुई, तो मनोज कुमार ने उन्हें ईमानदारी से कहा स्क्रिप्ट कमजोर थी। एक दिलचस्प बात ये भी है कि मनोज कुमार दिलीप कुमार के जबरदस्त फैन थे। दिलीप साहब की फिल्म ‘शबनम’ में उनका नाम था ‘मनोज’ उसके बाद हरिकृष्ण गोस्वामी ने वही नाम अपना भी रख लिया।

मनोज कुमार पिछले कई सालों से बीमार चल रहे थे। 21 फरवरी 2025 को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन 4 अप्रैल की सुबह शांतिपूर्वक वे इस दुनिया से विदा हो गए.. मनोज कुमार को उनके शानदार कार्य के लिए 7 फिल्मफेयर अवॉर्ड, पद्मश्री और दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.. मनोज कुमार अब भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके किरदार, उनके संवाद और उनका देश के प्रति प्रेम हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगा। उनके निधन की खबर से पूरे बॉलीवुड में शोक की लहर है (raveena tondan) भारत कुमार को अंतिम नमन करने उनके निवास पर फिल्मी हस्तियां और उनके चाहने वाले पहुंच रहे हैं..उनका अंतिम संस्कार 5 अप्रैल को मुंबई में पवन हंस में किया जाएगा. लेकिन भारत कुमार कभी मरते नहीं…वो हर भारतवासी के दिलों में अमर हैं..उनके चाहने वाले उन्हें अपने-अपने तरीके से याद कर रहे हैं..यूपी अमरोहा के एक कलाकार ने दीवार पर उनका चित्र बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है..