सीहोर-डाबरी से प्रेम राय की ग्राउंड रिपोर्ट
Dabri Forest Area : देश भर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के जरिए हर नागरिक से पेड़ लगाने की अपील कर रहे हैं, जबकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी करोड़ों पौधे लगाकर हरियाली बढ़ाने का अभियान चला रहे हैं। लेकिन इन सरकारी अभियानों और दावों के बीच सीहोर जिले के डाबरी वन क्षेत्र से सामने आई तस्वीरों ने वन विभाग और पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ग्रामीणों ने कक्ष क्रमांक 259 और 260 में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वनभूमि पर कथित अतिक्रमण के आरोप लगाए हैं। यदि ये आरोप सही हैं, तो सवाल सिर्फ पेड़ों के कटने का नहीं, बल्कि उस निगरानी तंत्र का है, जिसे जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। आखिर वन विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली, नियमित गश्त और मॉनिटरिंग कहां थी, और करोड़ों रुपये के पौधरोपण अभियानों के बावजूद पहले से मौजूद जंगलों को बचाने में सिस्टम विफल क्यों है।
क्या वन अमले की मिली भगत से पेड़ों का कत्लेआम हो रहा है ? आखिर वन भूमि पर अतिक्रमण कौन कर रहा है और कौन करवा रहा है ? डाबरी का मामला अब इन्हीं सवालों के केंद्र में आ गया है। स्वदेश न्यूज संवाददाता प्रेम राय खुद ग्राउंड जीरो पर पहुंचे..

बारिश के बीच जब स्वदेश न्यूज की टीम डाबरी के जंगलों में ग्राउंड जीरो पर पहुंची, तो स्थानीय ग्रामीणों ने जंगल में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और वनभूमि पर कथित अतिक्रमण का नजारा ना सिर्फ देखा बल्कि कैमरे में कैद भी किया। यहां के ग्रामीणों का दावा है कि यहां हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं और कुछ स्थानों पर वनभूमि पर कब्जे की गतिविधियां भी चल रही हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन मौके से सामने आए दृश्य निष्पक्ष जांच की मांग जरूर करते हैं।
Dabri Forest Area : पौधे लगाने के दावे, लेकिन जंगलों में सन्नाटा क्यों?
मध्यप्रदेश को देश का सबसे बड़ा वन क्षेत्र वाला राज्य माना जाता है। भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार राज्य में लगभग 77 हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक वन क्षेत्र दर्ज है, जो देश के कुल वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा है।
हर वर्ष राज्य सरकार और वन विभाग करोड़ों पौधे लगाने के लक्ष्य घोषित करते हैं। पिछले वर्षों में कई बार 30 करोड़ से अधिक पौधरोपण के अभियान चलाए गए हैं। वन विभाग, ग्रामीण विकास विभाग, नगरीय निकाय और अन्य एजेंसियां मिलकर व्यापक वृक्षारोपण कार्यक्रम संचालित करती हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो जंगलों में पेड़ों की कटाई के आरोप बार-बार क्यों सामने आते हैं?
Dabri Forest Area : डाबरी में क्या देखा स्वदेश न्यूज ने, कैमरे की नजर से देखिए..
ग्रामीणों ने हमारी टीम को जंगल के कई हिस्सों में ले जाकर ऐसे स्थान दिखाए, जहां ताजा कटाई के निशान, लकड़ी के अवशेष और जमीन से जुड़ी गतिविधियां दिखाई दीं।

सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई गई कि जिस क्षेत्र को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वह वन विकास निगम, सीहोर के नाके से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
अब ग्रामीण पूछ रहे हैं— “अगर जंगल में पेड़ गिरा और नाके तक आवाज नहीं पहुंची, तो फिर नाका जंगल की सुरक्षा के लिए है या सिर्फ बोर्ड लगाने के लिए?”

Dabri Forest Area : दो बीट बदलीं और बढ़ गया अतिक्रमण?
ग्रामीणों का आरोप है कि गांव से जुड़ी दो बीट किसी अन्य गांव को सौंपे जाने के बाद क्षेत्र में अतिक्रमण की गतिविधियां बढ़ीं। उनका कहना है कि यह मामला नया नहीं है, बल्कि कई महीनों से चल रहा है।
Dabri Forest Area : यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है
क्या बीट परिवर्तन के बाद नियमित गश्त हुई?
क्या वन सीमाओं का सत्यापन किया गया?
क्या उपग्रह या ड्रोन निगरानी का उपयोग किया गया?
यदि नहीं, तो आधुनिक वन प्रबंधन के दावों का क्या अर्थ रह जाता है?
Dabri Forest Area : अधिकारी बोलीं, “आज ही जानकारी मिली”
जब संबंधित वन विभाग की अधिकारी से इस पूरे मामले पर चर्चा की गई, तो उन्होंने बताया कि उन्होंने लगभग एक महीने पहले ही पदभार संभाला है और उन्हें इस मामले की जानकारी उसी दिन मिली। जानकारी मिलते ही वे मौके पर पहुंचीं और प्रारंभिक निरीक्षण किया, हालांकि फिलहाल केवल एक स्थान का ही निरीक्षण हो सका। यह बयान कई सवाल छोड़ जाता है। यदि ग्रामीणों के अनुसार मामला महीनों पुराना है, तो सूचना तंत्र कहां था?

Dabri Forest Area : मध्यप्रदेश में पौधरोपण पर कितना खर्च?
मध्यप्रदेश सरकार हर वर्ष हरित आवरण बढ़ाने, वन पुनर्स्थापन, सामाजिक वानिकी और पौधरोपण कार्यक्रमों पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करती है। विभिन्न बजटीय मदों और योजनाओं को मिलाकर यह राशि कई बार हजार करोड़ रुपये से अधिक भी पहुंचती है। वन विभाग स्वयं भी पौधरोपण, नर्सरी संचालन, संरक्षण और रखरखाव पर बड़ा व्यय करता है। यानी एक तरफ सरकार पौधे लगाने पर भारी निवेश कर रही है, दूसरी तरफ यदि स्थापित जंगलों में ही पेड़ों की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हों, तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि “क्या हम पेड़ उगा रहे हैं या सिर्फ पौधरोपण के फोटो ?


Dabri Forest Area : जांच के लिए जरूरी हैं ये कदम
ग्रामीणों और स्थानीय लोगों की मांग है कि केवल एक स्थान का निरीक्षण पर्याप्त नहीं होगा। पूरे कक्ष क्रमांक 259 और 260 की व्यापक जांच कराई जानी चाहिए।
- जांच में शामिल होने चाहिए
- वन सीमा का सीमांकन
- ड्रोन सर्वे
- भौतिक सत्यापन
- पूर्व और वर्तमान वन आवरण का GIS विश्लेषण
- कटे पेड़ों की प्रजाति और संख्या का आकलन
- लकड़ी के परिवहन और अनुमति रिकॉर्ड की जांच
- सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदार कौन?
ग्रामीणों ने विभागीय स्तर पर मिलीभगत और लापरवाही के गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि बिना जांच किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
लेकिन यदि जांच में यह साबित होता है कि
अवैध कटाई हुई,
वनभूमि पर अतिक्रमण हुआ,
निगरानी में लापरवाही बरती गई,
तो फिर जिम्मेदारी तय होना भी उतना ही जरूरी होगा।
Dabri Forest Area : बुदनी विधानसभा और विदिशा लोकसभा से जुड़ा मामला
डाबरी क्षेत्र बुदनी विधानसभा का हिस्सा है और विदिशा लोकसभा क्षेत्र से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए यह मामला केवल स्थानीय वन विवाद नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी दावों की विश्वसनीयता से भी जुड़ जाता है।
- पेड़ लगाने से बड़ा काम है पेड़ बचाना
- सरकारी अभियान कहते हैं, “एक पेड़ मां के नाम”।
- डाबरी के ग्रामीण पूछ रहे हैं, “जो पेड़ पहले से जंगल में खड़े थे, वे किसके नाम कटे?”
यह सवाल सिर्फ सीहोर का नहीं है। यह उस पूरे तंत्र से जुड़ा सवाल है, जो एक तरफ करोड़ों पौधे लगाने का दावा करता है और दूसरी तरफ यदि जंगलों में कटाई और अतिक्रमण के आरोप उठते हैं, तो उन्हें समय रहते रोक नहीं पाता। अब निगाहें वन विभाग, वन विकास निगम और जिला प्रशासन पर हैं। क्या पूरे क्षेत्र की निष्पक्ष जांच होगी? क्या कटाई के दावों की सच्चाई सामने आएगी? और क्या जंगल बचाने की जिम्मेदारी सिर्फ नारों से आगे बढ़कर जमीन पर भी दिखाई देगी? इन सवालों के जवाब अब जांच और कार्रवाई से ही सामने आएंगे। डाबरी के जंगलों से प्रेम राय की ग्राउंड रिपोर्ट।



