Chabahar Port: भारत और ईरान के बीच रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चाबहार पोर्ट के प्रबंधन को लेकर बातचीत लगातार जारी है। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता की नई पहल भी चर्चा में है। ऐसे समय में भारत चाबहार पोर्ट में अपने दीर्घकालिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए ईरान के साथ एक ऐसे समझौते पर काम कर रहा है, जिससे भविष्य में अमेरिकी प्रतिबंध हटने के बाद पोर्ट के संचालन में भारत की भूमिका बरकरार रह सके।
Chabahar Port: अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच समाधान तलाश रहा भारत
भारत फिलहाल अमेरिकी प्रतिबंधों को ध्यान में रखते हुए सावधानी से आगे बढ़ रहा है। अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने चाबहार पोर्ट परियोजना के लिए भारत को छह महीने की प्रतिबंध छूट दी थी, जिसकी अवधि 25 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई। अब भारत चाहता है कि प्रतिबंध हटने की स्थिति में उसकी निवेश और संचालन संबंधी हिस्सेदारी सुरक्षित रहे।
Chabahar Port: चाबहार पोर्ट के प्रबंधन पर ईरान से चल रही बातचीत
सूत्रों के अनुसार भारत सरकार चाबहार पोर्ट के संचालन को लेकर ईरान की स्थानीय पोर्ट अथॉरिटी के साथ समझौते पर चर्चा कर रही है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत फिलहाल पोर्ट का प्रबंधन स्थानीय स्तर पर जारी रहेगा, लेकिन भविष्य में यदि अमेरिकी प्रतिबंध समाप्त होते हैं तो प्रबंधन का अधिकार फिर से भारत को सौंपा जा सकेगा।
Chabahar Port: भारत कानूनी गारंटी भी चाहता है
भारत इस समझौते में कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर भी जोर दे रहा है। सरकार चाहती है कि ईरानी पक्ष लिखित रूप में यह गारंटी दे कि प्रतिबंध हटने के बाद दोनों देशों के बीच हुए समझौते का पूरी तरह पालन किया जाएगा और भारत के अधिकार सुरक्षित रहेंगे।
Chabahar Port: भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है चाबहार पोर्ट?
विशेषज्ञों के अनुसार चाबहार पोर्ट भारत की सामरिक और आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा है। यह बंदरगाह भारत को पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी व्यापारिक पहुंच उपलब्ध कराता है। इसके अलावा यह हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक मौजूदगी को भी मजबूत करता है।
चीन की बढ़ती दिलचस्पी भी भारत की चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत चाबहार पोर्ट में अपनी सक्रिय भूमिका बनाए नहीं रखता, तो चीन इस रणनीतिक परियोजना में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर सकता है। यही कारण है कि भारत लगातार बदलते भू-राजनीतिक हालात के बावजूद इस परियोजना से जुड़ा हुआ है।
अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार का अहम मार्ग
चाबहार पोर्ट केवल भारत और ईरान के बीच व्यापार का केंद्र नहीं है, बल्कि यह अफगानिस्तान, मध्य एशिया और खाड़ी क्षेत्र के देशों तक पहुंच का भी महत्वपूर्ण मार्ग है। इस परियोजना के माध्यम से भारतीय सामान इन क्षेत्रों तक अपेक्षाकृत आसान और कम लागत में पहुंच सकते हैं।
Chabahar Port: परियोजना से पीछे हटना भारत के लिए हो सकता है नुकसानदायक
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारत चाबहार परियोजना से पीछे हटता है तो उसे अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप तक जमीनी व्यापारिक संपर्क विकसित करने का एक बड़ा अवसर गंवाना पड़ सकता है। यही वजह है कि भारत इस परियोजना को लंबे समय तक जारी रखने के पक्ष में है।
Chabahar Port: 2016 के त्रिपक्षीय समझौते से मिली थी नई दिशा
चाबहार पोर्ट के रणनीतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इस समझौते का उद्देश्य व्यापार, परिवहन और क्षेत्रीय संपर्क को मजबूत करना था। इसके बाद भारत ने पोर्ट के विकास में निवेश बढ़ाया और परियोजना को आगे बढ़ाने की दिशा में कई कदम उठाए।
Chabahar Port: अमेरिकी प्रतिबंधों से धीमी हुई परियोजना
भारत वर्ष 2019 तक ईरान से तेल आयात भी करता रहा और चाबहार पोर्ट के विस्तार को लेकर दोनों देशों के बीच बातचीत जारी थी। हालांकि बाद के वर्षों में अमेरिका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों और व्यापारिक दबाव के कारण इस परियोजना की रफ्तार प्रभावित हुई। इसके बावजूद भारत ने चाबहार पोर्ट में अपनी रणनीतिक रुचि बनाए रखी और अब भी भविष्य के लिए इसे महत्वपूर्ण परियोजना मान रहा है।
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