युद्धग्रस्त ईरान में फंसे भोपाल के 2 बच्चे: कोई लौटना चाहता है, कोई नहीं

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ईरान में जारी युद्ध ने दुनियाभर में कई लोगों की ज़िंदगी को प्रभावित किया है, और अब इसकी आंच भोपाल तक भी पहुंची है। मध्यप्रदेश की राजधानी के दो छात्र—गुल अफशान और अबरार अली—वर्तमान में ईरान में फंसे हुए हैं। एक जान बचाकर भारत लौटना चाहती है, तो दूसरा अपने सिद्धांतों के कारण वहीं रुकने का फैसला कर चुका है।

गुल अफशान: बमबारी से डरी, एयरपोर्ट तक नहीं पहुंच सकीं

28 वर्षीय गुल अफशान, ईरान के मशहद शहर स्थित जामियातुल मुस्तफा यूनिवर्सिटी में आलिमा कोर्स से पीएचडी कर रही हैं। वे बार-बार एयरपोर्ट तक पहुंचने की कोशिश कर चुकी हैं, लेकिन लगातार हो रही बमबारी ने उनके हर प्रयास को विफल कर दिया।

डर के साए में हॉस्टल में कैद

गुल की मां शाहीन काजमी मुसावी ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि उनकी बेटी ने खुद को हॉस्टल के कमरे में बंद कर लिया है। डर इतना है कि बाहर निकलना भी मुमकिन नहीं रहा।

“हमारी बेटी डरी हुई है, और हम हर पल उसकी सलामती के लिए दुआ कर रहे हैं,” – शाहीन काजमी मुसावी

सरकार से मदद की गुहार

परिवार को समझ नहीं आ रहा कि वह किससे संपर्क करें। उन्होंने भारत सरकार से अपील की है कि उनकी बेटी को जल्द से जल्द सुरक्षित घर वापस लाया जाए। उन्हें उम्मीद है कि मीडिया की कवरेज से उनकी आवाज सरकार तक पहुंचेगी।

मोबाइल बंद करने का आदेश

गुल के भाई मोहम्मद जवाद के अनुसार, ईरानी प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से सभी मोबाइल फोनों को बंद करने का निर्देश दिया है। इससे परिजनों की चिंता और भी बढ़ गई है।


अबरार अली: संकट में भी ईरान छोड़ने को तैयार नहीं

दूसरी ओर, 30 वर्षीय अबरार अली ने विपरीत फैसला लिया है। वे पिछले चार वर्षों से ईरान के कोम शहर में धर्मशास्त्र की पढ़ाई कर रहे हैं और मौलवीयत कोर्स के अंतिम वर्ष में हैं।

‘मुश्किल समय में साथ छोड़ना अन्याय होगा’

अबरार ने कहा कि वे इस समय ईरान छोड़कर नहीं जाएंगे, क्योंकि जब सब कुछ ठीक था, तब उन्होंने इसी देश से ज्ञान अर्जित किया। अब जबकि देश मुश्किल दौर में है, उन्हें छोड़कर जाना नैतिक रूप से गलत होगा।

मां का चिंता और संतोष

उनकी मां शनोरी अली चिंतित तो हैं, लेकिन बेटे के फैसले का सम्मान करती हैं। उन्होंने कहा,

“मैं चाहती हूं कि वह सुरक्षित लौटे, लेकिन वह जिस शहर में है वह अपेक्षाकृत शांत है, इससे थोड़ी राहत मिलती है।”

निष्कर्ष: उम्मीद और हिम्मत की दो कहानियां

भोपाल के इन दोनों छात्रों की कहानी एक ही संकट की दो अलग तस्वीरें पेश करती है—एक भयभीत होकर लौटना चाहती है, तो दूसरा अपने सिद्धांतों पर अडिग है। इन हालात में सरकार और विदेश मंत्रालय की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।

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