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मोदी सरकार की कूटनीतिक जीत, आतंकी फांसी के फंदे के नजदीक !

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Diplomatic victory of Modi Government, terrorist is close to the gallows!

‘आतंक का डॉक्टर’ तो घसीट लाए, अब इनकी बारी, मोदी की तैयारी ?

BY: Vijay Nandan

दिल्ली: आखिरकार भारत 26/11 के मास्टरमाइंड तहव्वुर राणा को अमेरिका से घसीटकर ले ही आया, अब भारत की अदालत तय करेगी कि 175 बेगुनाहों की हत्या के जिम्मेदार आतंकी को क्या सजा दी जाए. लेकिन उससे पहले देश के लिए ये गर्व और उपलब्धि का समय है. हमारी सरकार सात समंदर पार से उस आतंकी को पकड़ लाई..जिसे लाना नामुमकिन हो गया था. क्या ये मोदी सरकार की बड़ी कूटनीतिक जीत है, क्या ये आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक मोर्चा है, क्या ये कामयाबी बताती है कि भारत अब विक्टिम नेशन नहीं, प्रोएक्टिव पावर है, क्या ये ऑपरेशन भारत की वैश्विक साख और निर्णायक नेतृत्व को भी दर्शाता है..पढि़ए ये खास रिपोर्ट

    आतंकवाद से लड़ाई में आज की तारीख इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गयी, मोदी सरकार ने असंभव कार्य कर दिखाया. मुंबई आतंकी हमले के 17 साल बाद, इस भयावह साजिश के मास्टरमाइंड तहव्वुर हुसैन राणा को अमेरिका से घसीट लाई केंद्र सरकार.. इस प्रत्यर्पण के साथ भारत ने न केवल अपने आतंक विरोधी संकल्प को दुनिया के सामने दोहराया है, बल्कि दुनिया के राजनयिक मोर्चे पर भी बड़ी सफलता अर्जित की है।

मुम्बई का गुनाहगार सजा की दहलीज पहुंचा तो 17 साल पुराने घाव फिर हरे हो गए..2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले ने न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर दिया था। 175 लोगों की मौत और सैकड़ों जख्मी– यह हमला भारत की आत्मा पर सीधा वार था। इस हमले की साजिश रचने वालों में डेविड हेडली और उसका साथी तहव्वुर राणा अहम किरदार थे।

  • मुम्बई ये रहा तेरा ‘गुनहगार’
  • फांसी का फंदा कर लो तैयार !
  • आतंकवाद पर केंद्र का निर्णायक ‘प्रहार’
  • इंडिया ‘विक्टिम’ नहीं, ‘प्रोएक्टिव पावर’
  • प्रत्यर्पण पर भारत की 3 ‘रण’नीति
  • कानून, लॉबिंग और कूटनीति !
  • गिरफ्त में 26/11 का ‘मास्टरमाइंड’
  • जेल में 175 बेगुनाहों का कातिल
  • राणा के खिलाफ भारत में सबूतों का जाल
  • अब अदालत करेगी मौत के फंदे का इंतजाम
  • मोदी-ट्रंप दोस्ती से बनी प्रत्यर्पण की राह !
  • बैकफुट पर पाक, राणा को पहचानने से इनकार

कितनी चुनौतीपूर्ण थी राणा की वापसी? तहव्वुर राणा को भारत लाना कोई आसान काम नहीं था। शिकागो की अदालत ने एक वक्त उसे मुंबई हमलों में दोषमुक्त कर दिया था, जिससे यह प्रतीत होने लगा कि अब भारत उसे कभी नहीं ला सकेगा। लेकिन मोदी सरकार ने हार नहीं मानी। भारत की एजेंसियों ने राणा के खिलाफ नए सबूतों की एक मजबूत फाइल तैयार की – जिसमें उसकी पाकिस्तान यात्रा, लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क, और हेडली से मिलीभगत के प्रमाण शामिल थे।

रणनीति: कूटनीति, कानून और लॉबिंग का मिश्रण

मोदी सरकार की इस पूरे मिशन की कामयाबी के पीछे एक तीन-स्तरीय रणनीति रही है,

  1. कानूनी दबाव – भारत ने अमेरिकी न्यायपालिका को ठोस सबूत दिए और यह स्थापित किया कि राणा का मुकदमा भारत में चलना चाहिए।

अमेरिकी न्यायपालिका को ठोस सबूत दिए

  • कूटनीतिक वार्ता – अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट और भारत सरकार के बीच लगातार संवाद होता रहा, जिसमें भारत ने यह स्पष्ट किया कि राणा का प्रत्यर्पण न्याय के हित में है।

अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के साथ लगातार संवाद बनाए रखा

  1. अंतरराष्ट्रीय दबाव – भारत ने संयुक्त राष्ट्र और अन्य मंचों पर पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को उजागर करते हुए यह संदेश दिया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

     यूएन और अन्य मंचों पर पाक प्रायोजित आतंकवाद एक्सपोज किया

भले ही राणा का प्रत्यर्पण अब हो रहा है, लेकिन इसकी नींव मोदी और डोनाल्ड ट्रंप की दोस्ती के दौरान रखी गई थी। “Howdy Modi” और “Namaste Trump” जैसे कार्यक्रमों के जरिए दोनों देशों के बीच विश्वास का एक मजबूत पुल बना। ट्रंप कार्यकाल में ही भारत को यह आश्वासन मिला कि अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ उसके संघर्ष में साथ देगा। यही विश्वास बाइडन प्रशासन के दौरान भी कायम रहा और नतीजा आज सबके सामने है।

बाइट-

वीओ. आतंकी राणा की भारत वापसी सिर्फ एक व्यक्ति का प्रत्यर्पण नहीं, बल्कि पाकिस्तान की विफल रणनीति पर करारा तमाचा है। जिस देश ने हेडली और राणा जैसे लोगों को पनाह दी, वही अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेवजह सफाई देता फिर रहा है। पाकिस्तान ने तहव्वुर राणा से खुद को अलग कर लिया है। पाक विदेश कार्यालय ने एक वीडियो बयान जारी किया.

पाकिस्तान विदेश कार्यालय का बयान

 “तहव्वुर राणा ने पिछले दो दशकों में अपने पाकिस्तानी दस्तावेजों का नवीनीकरण नहीं कराया है। उसकी कनाडाई राष्ट्रीयता बहुत स्पष्ट है।

भारत का यह कड़ा रुख साफ संकेत देता है कि अब उसकी आतंकवाद नीति सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई पर आधारित है। तहव्वुर राणा की गिरफ्तारी 17 साल पुराने अपराध के खिलाफ भारत की न्याय-प्रतिबद्धता का प्रतीक है। इससे दुनिया को स्पष्ट संदेश गया है कि भारत अब सिर्फ पीड़ित नहीं, बल्कि एक प्रोएक्टिव ताकत है जो अपराधियों को दुनियाभर से पकड़कर ला सकता है। यह सिर्फ कानूनी नहीं, एक कूटनीतिक ऑपरेशन भी था – जो भारत की वैश्विक साख और निर्णायक नेतृत्व को दर्शाता है।

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