Supreme Court: आपराधिक मामलों में आरोपित नेताओं को मंत्री बनाने पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आपराधिक मामला दर्ज होने या कानूनी कार्यवाही शुरू होने के आधार पर किसी जनप्रतिनिधि को मंत्री पद के लिए अयोग्य ठहराने का नियम नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट का मानना है कि इस तरह के प्रतिबंध लागू करने से कई व्यावहारिक और संवैधानिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
Supreme Court: राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए हो सकता है कानून का दुरुपयोग
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना हमेशा निष्पक्ष परिस्थितियों का परिणाम नहीं होता। कई बार राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने या उन्हें नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से भी आपराधिक मुकदमे दर्ज कराए जा सकते हैं।
अदालत ने आशंका जताई कि यदि किसी नेता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू होते ही उसे मंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाए, तो राजनीतिक विरोधी इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर सकते हैं। ऐसे में केवल आरोपों के आधार पर किसी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को संवैधानिक पद से दूर रखना उचित नहीं होगा।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर एक समान न्यायिक मानक तय करना आसान नहीं है। इसके लिए ऐसी परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा, जिनमें राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू कराई जा सकती है।
Supreme Court: याचिका में क्या की गई थी मांग?
इस जनहित याचिका में केंद्र और राज्य सरकारों में मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने अदालत से ऐसे नेताओं को मंत्री बनाए जाने पर रोक लगाने के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की थी, जो आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं।
याचिका में दलील दी गई थी कि प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मंत्रिमंडल में मंत्रियों की नियुक्ति के लिए सिफारिश करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। हालांकि, इस अधिकार का इस्तेमाल करते समय सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिकता जैसे पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
याचिका का मुख्य उद्देश्य यह था कि आपराधिक मामलों में आरोपित व्यक्तियों को मंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपने से पहले कुछ स्पष्ट कानूनी मानक निर्धारित किए जाएं। इससे राजनीति और शासन व्यवस्था में सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
Supreme Court: 2014 के मनोज नरूला मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था फैसला
मंत्रियों की नियुक्ति और आपराधिक मामलों के संबंध में सुप्रीम कोर्ट पहले भी अपना रुख स्पष्ट कर चुका है। वर्ष 2014 में मनोज नरूला बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था।
उस समय संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि न्यायपालिका अपनी व्याख्या के माध्यम से जनप्रतिनिधियों की अयोग्यता के लिए नए नियम नहीं बना सकती। यानी संविधान और मौजूदा कानूनों में जिन आधारों पर किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य ठहराने का प्रावधान है, अदालत उनमें अपनी ओर से नए प्रतिबंध नहीं जोड़ सकती।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों से यह अपेक्षा जरूर की थी कि वे मंत्रियों की नियुक्ति करते समय अपने संवैधानिक विवेक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करें। अदालत ने कहा था कि गंभीर और जघन्य आपराधिक मामलों का सामना कर रहे व्यक्तियों, विशेषकर भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों में, मंत्रियों की नियुक्ति से बचना चाहिए।
Supreme Court: मंत्रियों की नियुक्ति पर नए नियम बनाना संसद का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 2014 के फैसले में यह भी स्पष्ट किया था कि मंत्रियों की नियुक्ति को लेकर अतिरिक्त प्रतिबंध लगाने और नए कानूनी प्रावधान तैयार करने का अधिकार संसद और संबंधित राज्य विधानसभाओं के पास है।
अदालत के मुताबिक, यदि जनप्रतिनिधियों की मंत्रिमंडल में नियुक्ति को लेकर कोई अतिरिक्त कानूनी व्यवस्था जरूरी समझी जाती है, तो इसके लिए विधायिका को कानून बनाने की प्रक्रिया अपनानी होगी। न्यायपालिका अपनी ओर से ऐसे नए प्रतिबंध लागू नहीं कर सकती, जिनका मौजूदा संवैधानिक और कानूनी ढांचे में प्रावधान नहीं है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं और मंत्रियों की नियुक्ति में संवैधानिक विवेकाधिकार के महत्व को रेखांकित किया है। अदालत के फैसले से यह स्पष्ट है कि केवल आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के आधार पर किसी नेता को मंत्री पद से रोकने के लिए न्यायिक दिशा-निर्देश तय करना उचित नहीं होगा।


