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Indian National Flag Production: ग्वालियर का मध्य भारत खादी संघ: जहाँ आकार लेता है देश का स्वाभिमान ‘तिरंगा’

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Indian National Flag Production

Indian National Flag Production मध्य प्रदेश का ऐतिहासिक शहर ग्वालियर न केवल अपने विशाल किलों और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के सबसे पवित्र प्रतीक—हमारे राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगे’—के निर्माण में भी एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ग्वालियर में स्थित ‘मध्य भारत खादी संघ’ उत्तर भारत का इकलौता ऐसा खादी संस्थान है, जिसे भारत सरकार की शीर्ष संस्था ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) और खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) द्वारा आधिकारिक तथा प्रमाणित तिरंगा बनाने की कानूनी मान्यता मिली हुई है। जब भी 15 अगस्त या 26 जनवरी को देश के कोने-कोने में या दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर हमारा राष्ट्र ध्वज शान से फहराता है, तो उसकी हर एक सिलवट में ग्वालियर की मिट्टी की खुशबू और यहाँ के कारीगरों की निष्ठा शामिल होती है।

Indian National Flag Production गांधीवादी विचारों से प्रेरणा: इतिहास और स्थापना

Indian National Flag Production मध्य भारत खादी संघ की नींव आजादी के बाद वर्ष 1956 में रखी गई थी। इसका मूल उद्देश्य राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के खादी आंदोलन, स्वावलंबन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता के विचार को जीवंत बनाए रखना था। शुरुआत में खादी के वस्त्र तैयार करने वाले इस संघ ने धीरे-धीरे अपनी गुणवत्ता को इस स्तर पर पहुँचाया कि 2000 के दशक में इसे ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) के कड़े मानकों को पूरा करने के बाद आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण की मान्यता प्रदान की गई। पूरे भारत में केवल कुछ ही चुने हुए केंद्र हैं (जैसे कर्नाटक का हुबली और मध्य प्रदेश का ग्वालियर) जिन्हें कानूनन सरकारी और राष्ट्रीय आयोजनों के लिए खादी का झंडा बनाने का अधिकार है। ग्वालियर में तैयार होने वाले तिरंगे केवल मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इन्हें उत्तर भारत के कई राज्यों, केंद्रीय मंत्रालयों, संसद भवन और देश के सबसे बड़े राष्ट्रीय आयोजनों के लिए भेजा जाता है।

Indian National Flag Production महिला शक्ति की अटूट साधना और समर्पण

ग्वालियर के मध्य भारत खादी संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि हमारे देश की शान को आकार देने के पीछे महिला कारीगरों की निस्वार्थ लगन, कड़ी मेहनत और देशभक्ति की भावना है।

राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण में लगने वाले कच्चे सूत की कताई से लेकर, कपड़े की बुनाई, सटीक नाप-जोख के साथ कटाई, ध्वज चक्र की छपाई और फिर अंतिम सिलाई तक का लगभग पूरा कार्य महिला कारीगरों द्वारा बेहद अनुशासन और सम्मान के साथ पूरा किया जाता है।

स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) और गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) से कई महीने पहले ही यहाँ काम का माहौल बेहद व्यस्त हो जाता है। देश की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए ये महिला कारीगर दिन-रात एक करके पूरी निष्ठा के साथ तिरंगे का निर्माण करती हैं। उनके लिए यह केवल एक रोजगार या सिलाई का काम नहीं है, बल्कि देश की आन-बान-शान को गढ़ने का एक पवित्र अवसर है।

Indian National Flag Production राष्ट्रीय ध्वज का निर्माण: 20 से 25 कड़े मानकों की परीक्षा (BIS Standards)

भारत में राष्ट्रीय ध्वज बनाना कोई साधारण कपड़े की सिलाई का काम नहीं है। इसके लिए ‘भारतीय ध्वज संहिता’ (Flag Code of India) का रत्ती भर भी उल्लंघन किए बिना कड़ाई से पालन करना अनिवार्य होता है। ग्वालियर में तैयार होने वाले हर एक तिरंगे को अपनी पूर्णता सिद्ध करने के लिए लगभग 20 से 25 प्रकार की कड़े परीक्षणों (Quality Checks) की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है:

विशेष खादी कपड़ा (Handwoven Cotton Khadi): झंडा बनाने के लिए केवल हाथ से कते और बुने गए शुद्ध सूती खादी के कपड़े का ही इस्तेमाल किया जाता है। कपड़े की मजबूती और धागे का घनत्व (प्रति इंच धागे की संख्या) पूरी तरह मानक के अनुसार होना चाहिए।

सटीक रंग और पट्टियों का अनुपात: केसरिया, सफेद और हरे—तीनों रंगों के शेड, डाई की गुणवत्ता और कपड़े की बनावट को वैज्ञानिक तरीके से जांचा जाता है। तीनों पट्टियों का अनुपात हमेशा सटीक होना चाहिए।

नेवी ब्लू अशोक चक्र की स्क्रीन प्रिंटिंग: सफेद रंग की मध्य पट्टी के ठीक बीचों-बीच 24 तीलियों वाले अशोक चक्र की छपाई या कढ़ाई की जाती है। यह चक्र गहरे नीले (Navy Blue) रंग का होता है और इसे इस तरह छापा जाता है कि ध्वज के दोनों तरफ से यह समान रूप से स्पष्ट और सुडौल दिखाई दे।

सिलाई की मजबूती और 9 मानक आकार: ध्वज को सिलने के लिए इस्तेमाल होने वाले धागे की गुणवत्ता और मजबूती अत्यधिक उच्च स्तर की होती है। ध्वज के आकार (जो कि कानूनन 9 निर्धारित मानकों में आते हैं) की नाप-जोख में 1 मिलीमीटर का भी अंतर स्वीकार नहीं किया जाता।

अंतिम रिजेक्शन और BIS की मुहर: यदि परीक्षण के दौरान किसी भी झंडे में जरा सा भी दोष, रंग का हल्का-भारीपन या सिलाई में 1 मिलीमीटर की भी असमानता पाई जाती है, तो उस झंडे को तुरंत रिजेक्ट (अस्वीकृत) कर दिया जाता है। केवल सभी 20-25 मानकों पर पूरी तरह से खरे उतरने वाले झंडों पर ही BIS (ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स) का आधिकारिक होलोग्राम या सील लगाई जाती है।

गौरव की अमर गाथा

जब भी 15 अगस्त या 26 जनवरी को लाल किले की प्राचीर पर या देश के किसी भी कोने में हमारा प्यारा तिरंगा नीले आकाश में लहराता है, तो उसके पीछे ग्वालियर के मध्य भारत खादी संघ की महिला कारीगरों की अनथक मेहनत, शुद्ध खादी का ताना-बाना और भारत की अमूल्य परंपरा छिपी होती है। ग्वालियर का यह खादी संघ केवल एक संस्था नहीं, बल्कि हर भारतीय के स्वाभिमान, गौरव और देशभक्ति की अमर गाथा का जीवंत केंद्र है।

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