Trump ने सऊदी अरब के सामने रखी नई शर्त, न्यूक्लियर डील के लिए इजरायल से रिश्ते सामान्य करना होगा जरूरी

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Trump: अमेरिका और सऊदी अरब के बीच प्रस्तावित सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम समझौते में नया मोड़ आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील के लिए एक अतिरिक्त शर्त जोड़ते हुए कहा है कि सऊदी अरब को पहले Abraham Accords के तहत इजरायल के साथ अपने राजनयिक संबंध सामान्य करने होंगे। यह बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि समझौते की घोषणा के समय इस शर्त का कोई उल्लेख नहीं किया गया था।

Trump: न्यूक्लियर डील के बाद ट्रंप ने जोड़ी नई शर्त

सऊदी अरब के साथ सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर समझौते की घोषणा के अगले ही दिन डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि यह डील तभी पूरी होगी जब सऊदी अरब Abraham Accords का हिस्सा बनेगा और इजरायल के साथ अपने संबंध सामान्य करेगा।

ध्यान देने वाली बात यह है कि समझौते की घोषणा के दौरान न तो अमेरिका के ऊर्जा विभाग ने और न ही सऊदी अरब सरकार ने इस शर्त का जिक्र किया था। ऐसे में ट्रंप का बाद में दिया गया बयान कई सवाल खड़े कर रहा है।

Trump: नई शर्त से डील की राह हो सकती है कठिन

विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की इस नई शर्त से सिविल न्यूक्लियर समझौते को अंतिम मंजूरी मिलने की प्रक्रिया जटिल हो सकती है। क्योंकि सऊदी अरब पहले ही इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने को लेकर अपनी स्पष्ट शर्तें सामने रख चुका है।

ऐसे में यदि दोनों देशों के बीच राजनीतिक सहमति नहीं बनती है तो परमाणु समझौते की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है।

Trump: इजरायल के साथ संबंधों पर क्या है सऊदी अरब का रुख

सऊदी अरब लगातार यह कहता रहा है कि इजरायल के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध तभी स्थापित किए जा सकते हैं जब फिलिस्तीनी राज्य के गठन का स्पष्ट और विश्वसनीय रास्ता तैयार हो।

दूसरी ओर इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना के प्रस्ताव को सुरक्षा के लिहाज से व्यावहारिक नहीं मानते हैं। इसी कारण दोनों पक्षों के बीच यह मुद्दा अब भी सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।

Trump: Abraham Accords क्या है

Abraham Accords अमेरिका की मध्यस्थता में तैयार किए गए कई राजनयिक समझौतों का समूह है। इसका उद्देश्य इजरायल और मुस्लिम बहुल देशों के बीच राजनयिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को सामान्य बनाना है।

इस समझौते पर 15 सितंबर 2020 को व्हाइट हाउस में हस्ताक्षर किए गए थे। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें इजरायल और अरब देशों के बीच संबंध स्थापित करने को इजरायल-फिलिस्तीन विवाद के समाधान से अलग रखा गया।

Trump: किन देशों ने Abraham Accords को अपनाया

Abraham Accords का नाम पैगंबर अब्राहम के नाम पर रखा गया है, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्मों में सम्मान दिया जाता है।

अब तक संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और सूडान जैसे देशों ने इस समझौते के तहत इजरायल के साथ अपने संबंध सामान्य किए हैं। समय के साथ अन्य देशों के साथ भी इस दिशा में बातचीत होती रही है। सऊदी अरब को इस समझौते में शामिल करना अमेरिका की बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि माना जाता है।

Trump: सऊदी अरब की भागीदारी क्यों मानी जा रही अहम

मध्य पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब की महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि सऊदी अरब भी Abraham Accords का हिस्सा बनता है तो क्षेत्रीय कूटनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे इजरायल और अरब देशों के बीच सहयोग बढ़ेगा, लेकिन फिलिस्तीन मुद्दे का समाधान निकले बिना इस दिशा में आगे बढ़ना आसान नहीं होगा।

Trump: ईरान को लेकर भी उठ रहे सवाल

सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित सिविल न्यूक्लियर समझौते को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि अमेरिका ने पहले ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर सख्त रुख अपनाया था, जबकि अब सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग को आगे बढ़ाया जा रहा है।

इसी वजह से इस समझौते को लेकर वैश्विक रणनीति और अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति पर भी नई बहस शुरू हो गई है।

Trump: पश्चिम एशिया की राजनीति पर पड़ सकता है असर

ट्रंप की नई शर्त ने सऊदी अरब, इजरायल और अमेरिका के त्रिपक्षीय संबंधों को एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। यदि सऊदी अरब इजरायल के साथ संबंध सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ता है तो इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की कूटनीति, क्षेत्रीय सुरक्षा और भविष्य के आर्थिक सहयोग पर पड़ सकता है। वहीं, फिलिस्तीन मुद्दे पर सहमति न बनने की स्थिति में न्यूक्लियर डील की राह लंबी और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

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