BY
Yoganand Shrivastava
Prayagraj कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि जब दो शिक्षित और बालिग व्यक्ति लंबे समय तक (इस मामले में 2019 से 2025 तक) एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध में रहते हैं, तो इसे ‘सहमति’ माना जाएगा। अदालत के अनुसार, यदि संबंध वर्षों तक जारी रहते हैं और इस दौरान गर्भपात जैसी स्थितियां भी सामने आती हैं, तो केवल शादी से इनकार कर देने भर से इसे धोखे से प्राप्त की गई सहमति या बलात्कार नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए आरोपी को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
Prayagraj सुप्रीम कोर्ट के नजीर का हवाला: ‘सहमति बनाम धोखा’
Prayagraj इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का संदर्भ दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि “शादी का झूठा वादा” और “शादी का वादा पूरा न कर पाना” दो अलग-अलग स्थितियां हैं।
- अवधारणा: यदि कोई महिला लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ संबंध में रहती है और सामाजिक रूप से भी वे जुड़े हुए हैं, तो कानून इसे ‘सहमति’ की अवधारणा (Assumption of Consent) के तहत देखता है।
- तथ्य छिपाना: कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पीड़िता ने एफआईआर में अपनी पिछली शादी (तलाकशुदा होने) की जानकारी छिपाई थी, जिससे केस की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े हुए।
Prayagraj आर्टिकल 21 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता: 12 जोड़ों को सुरक्षा
Prayagraj एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में, हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और ‘पार्टनर चुनने के अधिकार’ को सर्वोपरि रखा। अदालत ने अलग-अलग धर्मों के 12 प्रेमी जोड़ों को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया।
कोर्ट की टिप्पणी: उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021 के कड़े प्रावधान केवल वहीं लागू होते हैं, जहाँ वास्तव में जबरन धर्म परिवर्तन हुआ हो। यदि दो बालिग बिना धर्म बदले लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, तो उन्हें सुरक्षा देना राज्य की जिम्मेदारी है, क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 21 उन्हें अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार देता है।





