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अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव: “गीता केवल ग्रंथ नहीं, मानव जीवन की जटिल समस्याओं का शाश्वत समाधान है: राज्य मंत्री

Report: Aakash sen

भोपाल: धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र की पावन धरा पर आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय गीता महोत्सव’ में मध्यप्रदेश की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना की गूंज सुनाई दी। महोत्सव के मुख्य मंच से संस्कृति, पर्यटन और धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र भाव सिंह लोधी ने श्रीमद्भगवद्गीता को संपूर्ण मानव जाति का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ और जीवन दर्शन का आधार बताया।

जीवन एक महायुद्ध, गीता सिखाती है स्थितप्रज्ञता
अपने सारगर्भित संबोधन में राज्य मंत्री श्री लोधी ने कहा कि कुरुक्षेत्र वह पवित्र भूमि है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन के अंतर्मन के द्वंद्व को ज्ञान के प्रकाश से हर लिया था। उन्होंने जीवन को परिभाषित करते हुए कहा, “जीवन स्वयं एक महायुद्ध है—धर्म और अधर्म का, कर्तव्य और मोह का। गीता हमें सिखाती है कि संघर्षों के बीच भी मन को कैसे स्थिर और संतुलित रखा जाए। यही ‘स्थितप्रज्ञता’ है और यही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है।”

समस्याओं का निदान और कर्म का सिद्धांत
गीता की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में समस्याओं से अधिक महत्व उनके समाधान की विधियों का है। जब जीवन में ‘क्या करें और क्या न करें’ की विकट स्थिति (कर्तव्य-अकर्तव्य) उत्पन्न होती है, तब गीता ही हमारा मार्गदर्शन करती है। उन्होंने ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ के श्लोक को उद्धृत करते हुए कहा कि निष्काम कर्म ही मोक्ष और परमगति का मार्ग है।

‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति और मध्यप्रदेश का गौरव
संबोधन में राष्ट्रवाद के स्वर को मुखर करते हुए राज्य श्री लोधी ने कहा कि कुरुक्षेत्र में भीष्म पितामह ने ‘राष्ट्र सर्वोपरि’ का मंत्र दिया था। आज उसी भावना को आत्मसात करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ‘राष्ट्र प्रथम’ की नीति से भारत को विश्व पटल पर सशक्त कर रहे हैं। उन्होंने मध्यप्रदेश का उल्लेख करते हुए कहा, “मैं अतुल्य भारत के ‘हृदय-प्रदेश’ से आता हूँ। हमारे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में धर्म, दर्शन और संस्कृति के नए आयाम स्थापित किए जा रहे हैं।”

सत्य, करुणा और कर्तव्य का संकल्प
अपने संबोधन के समापन में राज्य मंत्री श्री लोधी ने उपस्थित जनसमूह को एक पावन संकल्प दिलाया। उन्होंने कहा, “समय और परिस्थितियाँ बदलती हैं, लेकिन गीता का संदेश ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ अटल है। आइए, हम सत्य को अपनी भाषा, करुणा को अपना आचरण और कर्तव्य को अपना धर्म बनाएं।” इस अवसर पर पूज्य स्वामी रामभद्राचार्य , आचार्य प्रमोद कृष्णन, स्वामी ज्ञानानंद महाराज सहित अनेक पूज्य संत और भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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