सिद्धि और सौभाग्य योग में इस बार शुक्र प्रधान रहेगा करवा चौथ

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भोपाल में रात्रि 8.42 पर होंगे भूपृष्ठीय चंद्रमा के दर्शन


भोपाल। करवा चौथ त्योहार, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चन्द्रोदय व्यापिनी चतुर्थी करक चतुर्थी को मनाया जाता है। इस पर्व पर विवाहित स्त्रियाँ पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य एवं अपने सौभाग्य हेतु निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं और उदय उपरांत चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित कर भोजन करती हैं, इसलिए इस व्रत का कर्मकाल चन्द्रोदयकाल होता है। इस वर्ष चंद्रमा का उदय रात्रि 8 बजकर 42 मिनिट पर होगा। इसके पश्चात चंद्रमा के भूपृष्ठीय भाग के ऊपर आने पर 10 मिनट बाद परिपक्व चंद्रमा की पूजा की जाएगी। शुक्रवार के दिन चंद्रमा वृष राशि में रहेगा। इसका स्वामी शुक्र है यह प्रेम, दाम्पय सुख आदि का प्रतीक माना जाता है। अत: इस वर्ष का करवा चौथ शुक्र के प्रभाव से सुख-समृद्धि कारक होगा।
पंचांगकार पं. विनोद गौतम ने बताया कि यह सौभाग्यवती स्त्रियों का व्रत है। पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य, समृद्धि तथा अपने प्रति उसके स्थित प्रगाढ़ प्रणय की कामना से यह कठिन व्रत करती हैं। कुंवारी कन्याएं भी अनुकूल पति की कामना से यह व्रत रखती हैं। वे व्रत में सारा दिन निराहार रहती हैं, यहां तक कि जल तक ग्रहण नहीं करतीं। गौरी, गणेश की पूजा के अनन्तर करवाचौथ की कथा सुनने के बाद उदित चन्द्रमा को अर्घ्य देकर, पति का अभिवादन कर, फलाहार, ग्रहण करती हैं। मिट्टी के जलपूर्ण तिल-चावलयुक्त लघुकलश (करक-करवा) को पुण्यसंकल्पपूर्वक मिष्ठान, दक्षिणासहित अपनी सास, जेठानी आदि बड़े आदरणीय किसी संबंधी को अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इस दिन प्रात:काल से ही वे सौभाग्यवती स्त्रियाँ अलंकारादि से सुसज्जित होकर मंदिर आदि में जाकर भगवत दर्शन एवं पूर्जा-अर्चना आदि भी करती हैं।
करवाचौथ एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है, जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए निर्जला उपवास करती हैं और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं।
धार्मिक महत्व – करवाचौथ का व्रत पति-पत्नी के आत्मिक और अटूट रिश्ते का प्रतीक है, जो आपसी विश्वास, प्यार और स्नेह को बढ़ाता है। इस व्रत के दौरान महिलाएं पूरे दिन भूखे-प्यासे रहकर अपने सुहाग की लंबी आयु की कामना करती हैं। शास्त्रों के अनुसार, करवाचौथ के दिन चंद्रमा से अमृत की वर्षा होती है, जो पति की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए लाभकारी होती है।
पौराणिक महत्व – पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए करवाचौथ का व्रत रखा था, जिससे उन्हें अखंड सौभाग्य की प्राप्ति हुई। महाभारत में द्रौपदी ने भगवान श्री कृष्ण के कहने पर यह व्रत रखा था, जिससे पांडवों को सुख और सौभाग्य की प्राप्ति हुई। करवाचौथ का व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है, जबकि कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना के लिए यह व्रत करती हैं।
पूजा विधि – करवाचौथ की पूजा में भगवान शिव, पार्वती, कार्तिकेय और चंद्रमा का विशेष पूजन किया जाता है। महिलाएं पूरे दिन निर्जला उपवास करती हैं और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं। पूजा के दौरान शिव-पार्वती, कार्तिकेय और चंद्रमा की मूर्तियों की पूजा षोडशोपचार विधि से की जाती है।

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