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शुभांशु शुक्ला की धरती पर वापसी: क्या होता है स्प्लैशडाउन और कैसे हुआ स्पेसक्राफ्ट का लैंडिंग प्रोसेस?

Shubhanshu Shukla's return to Earth: What is splashdown and how did the spacecraft's landing process happen?

BY: Yoganand Shrivastva

भारत के अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) में 18 दिन बिताने के बाद आज सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर लौट आए। वे और उनकी टीम ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट के ज़रिए लौटे, और उनका स्पेसक्राफ्ट कैलिफोर्निया के तट के पास समुद्र में दोपहर 3:01 बजे स्प्लैशडाउन हुआ।

क्या होता है स्प्लैशडाउन?

जब कोई स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद समुद्र में उतरता है, तो उस प्रक्रिया को स्प्लैशडाउन (Splashdown) कहा जाता है। इस तरह की लैंडिंग को बेहद सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है, खासकर जब अंतरिक्ष यान को धरती की सतह के बजाय जल पर उतारना हो।

कैसी रही शुभांशु शुक्ला की वापसी?

शुभांशु शुक्ला के स्पेसक्राफ्ट ने पृथ्वी की ओर करीब 28,000 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से यात्रा शुरू की थी। जैसे ही स्पेसक्राफ्ट वायुमंडल में दाखिल हुआ, उसकी बाहरी परत का तापमान 1600 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। इसी दौरान डी-ऑर्बिट बर्न प्रोसेस शुरू हुआ।

डी-ऑर्बिट बर्न: सबसे अहम स्टेप

स्प्लैशडाउन से 54 मिनट पहले, यानी दोपहर 2:07 बजे, डी-ऑर्बिट बर्न की प्रक्रिया शुरू की गई। इसमें यान के थ्रस्टर्स की मदद से स्पीड घटाकर लगभग 24 किमी/घंटा कर दी जाती है, जिससे वह नियंत्रण में आ जाए और सुरक्षित लैंडिंग संभव हो सके। इस दौरान अंतरिक्ष यात्री स्पेस सूट पहने रहते हैं, और कैप्सूल के अंदर का तापमान महज़ 29-30 डिग्री सेल्सियस पर नियंत्रित रहता है।

Shubhanshu Shukla's return to Earth: What is splashdown and how did the spacecraft's landing process happen?

स्प्लैशडाउन से पहले के प्रमुख टाइमलाइन पॉइंट्स:

  • 2:07 PM: डी-ऑर्बिट बर्न शुरू
  • 2:26 PM: यान से ट्रंक अलग किया गया
  • 2:30 PM: नोज कोन बंद किया गया
  • 2:57 PM: स्टेबलाइजिंग पैराशूट खुले
  • 2:58 PM: मुख्य पैराशूट खुले
  • 3:01 PM: सफल स्प्लैशडाउन

समंदर में लैंडिंग और रिकवरी

कैप्सूल में लगे पैराशूट स्पेसक्राफ्ट की स्पीड को धीरे-धीरे कम करते हैं और अंत में उसे समुद्र में 24 किमी/घंटा की रफ्तार से उतारते हैं। पानी में लैंडिंग के बाद ग्राउंड टीम बोट के जरिए मौके पर पहुंचती है, कैप्सूल को बाहर निकालती है और उसमें मौजूद एस्ट्रोनॉट्स को सुरक्षित बाहर लाती है। इसके बाद उन्हें स्वास्थ्य परीक्षण और कुछ समय के लिए आइसोलेशन में रखा जाता है।


शुभांशु शुक्ला की यह वापसी भारत के लिए एक ऐतिहासिक क्षण रही। न केवल उन्होंने अंतरिक्ष में भारत का परचम लहराया, बल्कि स्प्लैशडाउन जैसी जटिल प्रक्रिया को भी सफलतापूर्वक पार किया। यह भारत के अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक और मील का पत्थर साबित हुआ है।

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