क्रिकेट की जीत का जश्न बना तनाव का कारण, देवास में पुलिस की सख्ती

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Cricket victory celebrations became a cause of tension, police strictness in Dewas

रिपोर्ट: शाहिद खान

देवास। क्रिकेट में भारतीय टीम की जीत का जश्न कुछ लोगों के लिए उत्साह की सीमा लांघकर हुड़दंग में बदल गया, जिससे देवास समेत मालवा के कई शहरों में माहौल तनावपूर्ण हो गया। महू के दंगों के बाद उज्जैन और देवास में भी भीड़ बेकाबू हो गई, और अनियंत्रित रूप से पटाखे जलाए गए और भीड़ पर उछाले गए। स्थिति तब और बिगड़ गई जब पुलिस ने इसे नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन कुछ लोगों ने पुलिस के साथ ही अभद्रता कर दी और उनके वाहन में तोड़फोड़ की कोशिश की।

पुलिस की सख्ती और जवाबी कार्रवाई

स्थिति को नियंत्रित करने के लिए देवास पुलिस ने कड़ी कार्रवाई की। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर कुछ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें सजा के तौर पर गंजा कराकर जुलूस भी निकाला गया। हालांकि, इस पूरी कार्रवाई के दौरान कुछ निर्दोष व्यापारियों को भी पुलिस के सख्त रवैये का शिकार होना पड़ा, जिससे विवाद और बढ़ गया।

राजनीतिक दखल और आरक्षक का लाइन अटैचमेंट

पुलिस की इस सख्त कार्रवाई पर राजनीतिक घमासान भी शुरू हो गया। भाजपा नेता मनीष सेन ने कथित निर्दोषों पर हुई कार्रवाई के खिलाफ आवाज उठाई, वहीं विधायक गायत्री राजे पवार ने भी पुलिस अधीक्षक से मुलाकात कर निर्दोषों की रिहाई की मांग की। इस दबाव के चलते गिरफ्तार लोगों को रिहा कर दिया गया और एक आरक्षक को लाइन अटैच भी कर दिया गया।

सोशल मीडिया पर गरमाया मामला

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर बीते दो दिनों से सोशल मीडिया पर जबरदस्त बहस चल रही है।

एक पक्ष पुलिस की कार्रवाई को सही ठहरा रहा है, क्योंकि भीड़ ने कानून व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश की।

वहीं, दूसरा पक्ष इसे पुलिस की ज्यादती बता रहा है, खासतौर पर निर्दोष व्यापारियों के खिलाफ हुई कथित सख्ती पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

पुलिस अधीक्षक का बयान और जांच का आदेश

पुलिस अधीक्षक ने आश्वासन दिया है कि पूरे मामले की गहन जांच की जाएगी। उन्होंने कहा कि एक सप्ताह के भीतर दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी, वहीं निर्दोषों को किसी भी तरह की सजा नहीं दी जाएगी।

क्या कहते हैं हालात?

क्रिकेट की जीत के उत्साह को हुड़दंग में बदलती भीड़, फिर भीड़ को नियंत्रित करने में जुटी पुलिस, कथित निर्दोषों पर कार्रवाई, भाजपा नेताओं का हस्तक्षेप—यह पूरा घटनाक्रम कई सवाल खड़े कर रहा है।

क्या उत्सव मनाने के नाम पर कानून तोड़ने वालों को सख्त सजा मिलनी चाहिए?

क्या पुलिस की कार्रवाई में निर्दोषों को निशाना बनाया गया?

राजनीतिक हस्तक्षेप से अपराधियों को फायदा हो रहा है या प्रशासनिक संतुलन बनाया जा रहा है?