मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई का बड़ा बयान: “भारत का संविधान सर्वोच्च, न कि संसद”

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BY: Yoganand Shrivastva

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि भारत में सर्वोच्च सत्ता संसद नहीं, बल्कि संविधान है। अमरावती में बार एसोसिएशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के तीनों प्रमुख स्तंभ — न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका — संविधान के अधीन कार्य करते हैं।

सीजेआई गवई ने कहा, “कुछ लोग यह मानते हैं कि संसद सर्वोच्च है, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में संविधान सर्वोच्च है। संसद के पास संविधान में संशोधन करने का अधिकार जरूर है, परंतु वह उसकी मूल संरचना (बेसिक स्ट्रक्चर) को नहीं बदल सकती।”


‘मूल संरचना सिद्धांत’ की पुनः पुष्टि

मुख्य न्यायाधीश ने 1973 के केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उस ऐतिहासिक फैसले में ‘मूल संरचना सिद्धांत’ को स्थापित किया था। इसके तहत संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह संविधान की मूल आत्मा — जैसे कि लोकतंत्र, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, और मौलिक अधिकार — को छू नहीं सकती।


न्यायाधीश की भूमिका पर टिप्पणी

सीजेआई ने कहा कि एक न्यायाधीश को निर्णय देते समय यह नहीं सोचना चाहिए कि समाज उसका मूल्यांकन कैसे करेगा। उन्होंने कहा, “केवल सरकार के खिलाफ फैसले देने से कोई न्यायाधीश स्वतंत्र नहीं हो जाता। संविधान ने जजों के लिए जो कर्तव्य निर्धारित किए हैं, उनका पूरी निष्ठा से पालन होना चाहिए।”


बुलडोजर एक्शन पर फैसला और shelter rights की बात

मुख्य न्यायाधीश गवई ने बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े एक मामले का जिक्र करते हुए कहा कि “आश्रय का अधिकार (Right to Shelter) मौलिक है और इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता।” उन्होंने कहा कि उन्होंने हमेशा अपने कर्तव्यों के अनुरूप काम किया और अपने फैसलों को ही अपनी आवाज़ बनने दिया।

उन्होंने कहा कि किसी भी आरोपी के घर को बिना कानूनी प्रक्रिया के ढहाया जाना संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन है। न्यायालय ने इस तरह की कार्रवाइयों पर अंकुश लगाने का कार्य किया है।


इटली में भी संविधान की सर्वोच्चता पर जोर

20 जून को मिलान, इटली में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम में सीजेआई गवई ने “सामाजिक-आर्थिक न्याय में संविधान की भूमिका” विषय पर बोलते हुए कहा था कि “सरकारें न तो न्यायाधीश बन सकती हैं और न ही निर्णायक।” उन्होंने बताया कि कैसे संविधान और न्यायपालिका ने पिछड़े, गरीब और हाशिये पर खड़े वर्गों को न्याय दिलाने का कार्य किया है।

उन्होंने आर्टिकल 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अनुच्छेद के तहत किसी भी नागरिक को विधिक प्रक्रिया के बिना उसके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

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