समोसे की यात्रा: शाकाहारी नहीं बल्कि मांसाहारी था

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BY: Yoganand Shrivastava

समोसा, जिसे आज हम अक्सर आलू-मटर और मसालों से भरे शाकाहारी स्नैक के रूप में जानते हैं, वास्तव में अपनी उत्पत्ति में मांसाहारी व्यंजन था। इसका जन्म मध्य एशिया और मध्य-पूर्व में हुआ, और इसे मूल रूप से यात्रियों के लिए तैयार किया गया था, ताकि लंबी यात्रा में भी यह ताजा रहे। 9वीं-10वीं शताब्दी में फारस (आज का ईरान) में ‘संबुसक’ नामक पकवान का ज़िक्र मिलता है, जो कि समोसे का प्राचीन रूप था। उस समय इसमें कीमा, सूखे मेवे और नट्स भरे जाते थे। इसका मकसद यात्रियों और व्यापारियों को पोषण और ऊर्जा प्रदान करना था। मध्य एशिया से व्यापार और शासन की गतिविधियों के चलते 13वीं-14वीं शताब्दी में यह व्यंजन भारत पहुंचा। दिल्ली सल्तनत के दौर में मुस्लिम शासकों और व्यापारियों ने इस स्वादिष्ट व्यंजन को अपने साथ भारत लाया। जब समोसा भारत आया, तो इसे देखकर स्थानीय लोगों ने इसे अपनाया और इसे अपनी संस्कृति के अनुसार ढाल लिया। भारत में शाकाहारी भोजन को प्राथमिकता देने वाले समाज के चलते आलू, मटर और अन्य मसालेदार सब्जियों को इसके अंदर भरा जाने लगा। धीरे-धीरे शाकाहारी समोसा इतना लोकप्रिय हुआ कि आज यह भारत में हर चाय की दुकान, हर सड़क के कोने और हर त्योहार का अभिन्न हिस्सा बन गया। हालांकि, इसका मांसाहारी रूप भी आज भी मौजूद है और कई हिस्सों में कीमा समोसा, चिकन समोसा और फिश समोसा के रूप में खाया जाता है। समोसे की यह यात्रा बताती है कि कैसे एक व्यंजन ने विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों और समय के साथ खुद को ढालते हुए आज हम तक पहुंचा। इसका इतिहास सिर्फ एक स्वादिष्ट स्नैक का नहीं, बल्कि व्यापार, यात्रा, संस्कृति और सामाजिक बदलाव की कहानी भी है। समोसा न केवल भोजन है, बल्कि यह इतिहास और विविधता का प्रतीक भी बन गया है, जो मध्य एशिया के ठंडे रेगिस्तानी रास्तों से निकलकर भारतीय गलियों और त्योहारों तक अपनी मिठास, मसाले और गर्माहट फैलाता रहा है।

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