संवाददाता – सुरेश भाटी, एडिट- विजय नंदन
बुलंदशहर में राशिद हत्याकांड को लेकर खानपुर पुलिस ने बड़ा और चौंकाने वाला खुलासा किया है। पुलिस के मुताबिक अमरपुर निवासी 48 वर्षीय राशिद की हत्या उसके ही भतीजे मुजम्मिल ने की थी।
“खून के रिश्ते” तब मज़बूत होते हैं जब उनमें समय, भरोसा और भावनाएं निवेश की जाएं। आधुनिक जीवनशैली और आर्थिक दबाव ने इस निवेश को कमजोर किया है। परिणामस्वरूप, रिश्ते पहले जितने स्थायी और अर्थपूर्ण नहीं रह गए। यही कारण है कि खून के रिश्ते पर खंजर चल रहा है। यही बुलंदशहर में राशिद हत्याकांड में हुआ।

कर्ज और फिरौती की साजिश
खानपुर पुलिस के अनुसार आरोपी मुजम्मिल एविएटर ऐप में कर्ज में डूबा हुआ था। पैसों की जरूरत के चलते उसने 23 सितंबर को अपने ताऊ राशिद की चाकू से हत्या कर दी। सिर और गर्दन पर वार कर वारदात को अंजाम देने के बाद शव को बाग में ठिकाने लगा दिया।
हत्या के अगले दिन 24 सितंबर को आरोपी ने मृतक के मोबाइल से ही उनके बेटे को फिरौती का मैसेज भेजकर 5 लाख रुपये की मांग की। पुलिस की जांच में यह पूरा मामला उजागर हुआ।
पुलिस ने बरामद किया शव व सबूत
पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर शव को बरामद कर लिया। साथ ही हत्या में प्रयुक्त आलाक़त्ल छुरी, वारदात के समय पहना गया लोअर और मृतक का मोबाइल भी पुलिस ने कब्जे में लिया। जांच में सामने आया कि आरोपी ने हत्या के बाद मृतक के मोबाइल से 15 हजार रुपये अपने खाते में भी ट्रांसफर किए थे।
आरोपी को जेल भेजा
खानपुर पुलिस व स्वाट टीम ने इस हत्याकांड का खुलासा करते हुए आरोपी मुजम्मिल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।
एसपी सिटी शंकर प्रसाद ने बताया कि पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तेजी से कार्रवाई की और आरोपी को पकड़ लिया।

नाते-रिश्तेदार ही नहीं, खून के रिश्ते भी बेमानी हो गए ?
बदलती जीवनशैली, शहरीकरण और व्यस्त दिनचर्या ने परिवारों के बीच समय कम कर दिया है। पहले लोग संयुक्त परिवारों में रहते थे, जिससे आत्मीयता और जवाबदेही दोनों बनी रहती थी; अब न्यूक्लियर फैमिली में यह भाव कम हो गया है। आर्थिक दबाव और व्यक्तिगत लक्ष्य, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और महंगे जीवन-स्तर ने हर किसी को अपने करियर, बिज़नेस या पैसों पर अधिक केंद्रित कर दिया। जहां पैसा और लक्ष्य प्राथमिक हो जाते हैं, वहां रिश्तों में भावनाओं का महत्व कम होने लगता है। डिजिटल युग और आभासी संबंध, सोशल मीडिया पर दिखने वाले “परफेक्ट” रिश्ते असलियत में अक्सर सतही होते हैं। लगातार वर्चुअल कनेक्शन के कारण व्यक्तिगत मुलाकात और भावनात्मक जुड़ाव कम हो जाता है। मूल्य और संस्कार में बदलाव, आधुनिकता ने व्यक्तिगत आज़ादी को बढ़ावा दिया, लेकिन सामूहिक ज़िम्मेदारी और त्याग की भावना कमजोर हो गई। पहले रिश्ते निभाना सामाजिक और धार्मिक कर्तव्य माना जाता था, अब इसे “चॉइस” समझा जाने लगा है। बढ़ती स्वार्थपरता और मानसिक तनाव, काम का तनाव, असुरक्षा और प्रतिस्पर्धा रिश्तों में धैर्य और भरोसे को घटाती है। लोग अपनी तकलीफ या जरूरत को रिश्तों पर प्राथमिकता देने लगे हैं।





