BY: Yoganand Shrivastva
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यात्रियों को उन राजमार्गों पर टोल टैक्स (Toll Tax) चुकाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, जो अधूरे हैं, गड्ढों से भरे हैं या लगातार जाम की वजह से चलने लायक नहीं हैं। अदालत ने कहा कि जनता से वसूली की बजाय उनकी सुरक्षा और सुविधा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
यह आदेश केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखता है, जिसमें त्रिशूर जिले के पलियेक्कारा टोल प्लाजा पर टोल वसूली पर रोक लगाई गई थी। मुख्य न्यायाधीश भूषण आर. गवई की अध्यक्षता वाली बेंच, जिसमें न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया शामिल थे, ने NHAI और कंस्ट्रक्शन कंपनी की अपील को खारिज कर दिया।
नागरिकों का हक़ सर्वोपरि
पीठ ने कहा कि नागरिकों को उन सड़कों पर स्वतंत्र रूप से चलने का अधिकार है, जिनके लिए वे पहले ही टैक्स चुका चुके हैं। उन्हें ऐसी टूटी-फूटी और अव्यवस्थित सड़कों पर दोबारा टोल नहीं देना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि एनएचएआई और उसके ठेकेदार सुरक्षित और निर्बाध सड़क उपलब्ध नहीं करा सकते, तो टोल वसूली करना अनुचित है।
जाम सिर्फ “ब्लैक स्पॉट्स” तक सीमित नहीं
NHAI ने दलील दी थी कि ट्रैफिक जाम केवल उन जगहों तक सीमित है, जहां अंडरपास का निर्माण कार्य चल रहा है। लेकिन अदालत ने कहा कि यदि 65 किलोमीटर लंबे मार्ग में से केवल 5 किलोमीटर भी अवरुद्ध हो, तो उसका असर पूरे रूट पर पड़ता है। हाल ही में एडापल्ली-मन्नुथी खंड पर जाम की वजह से वाहनों को 12 घंटे तक फंसे रहना पड़ा।
कोर्ट ने सवाल उठाया – “अगर सड़क पार करने में 12 घंटे लग जाते हैं, तो कोई व्यक्ति ₹150 टोल क्यों दे?”
आर्थिक नुकसान की दलील खारिज
NHAI और रियायतग्राही पक्ष ने कहा कि टोल बंद करने से रोज़ाना करीब ₹49 लाख का नुकसान होगा और सड़क रखरखाव पर असर पड़ेगा। इस पर अदालत ने दो टूक कहा कि नागरिकों का कल्याण और उनकी सुरक्षा, किसी भी वित्तीय नुकसान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।





