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सड़कों पर अंडे बेचे, ड्राइवर बने, फिर ऐसे चमके कि हीरो भी कांपते थे उनके सामने – यादें महमूद की

BY: Yoganand Shrivastva

भारतीय सिनेमा में ऐसे बहुत कम कलाकार हुए हैं जो सिर्फ कॉमेडियन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण कलाकार बनकर उभरे। महमूद अली उन्हीं नामों में से एक हैं, जिनकी मौजूदगी ने न केवल फिल्मों को जीवंत बना दिया, बल्कि हीरो की चमक भी फीकी कर दी। एक ऐसा नाम, जिसकी कॉमिक टाइमिंग पर दर्शकों ने सिर झुकाया और जो आज भी यादों में जिंदा है – भले ही उन्हें इस दुनिया से गए दो दशक से ज्यादा हो चुके हैं।

संघर्षों से शुरू हुआ सफर

महमूद भले ही एक फिल्मी परिवार से थे, लेकिन उनका जीवन कभी आसान नहीं रहा। उनके पिता मुमताज़ अली बॉम्बे टॉकीज़ के मशहूर डांसर और अभिनेता थे, लेकिन शराब की लत ने उनका करियर चौपट कर दिया। इसके बाद घर की जिम्मेदारी महमूद पर आ गई और उन्होंने छोटी उम्र में ही घर चलाने के लिए कई छोटे-मोटे काम शुरू कर दिए।

कभी अंडे बेचे, कभी ड्राइवरी की

अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए महमूद ने मुंबई की सड़कों पर अंडे बेचे, ड्राइवर का काम किया और यहां तक कि वह फिल्म निर्देशक पी. एल. संतोषी (राजकुमार संतोषी के पिता) के पर्सनल ड्राइवर भी बन गए थे। इसके अलावा वह घुड़सवारी सिखाने और टेबल टेनिस कोच के रूप में भी काम कर चुके थे।

फिल्मी दुनिया की तरफ बढ़ते कदम

सिनेमा में आने का सपना उन्हें हमेशा से था। शुरुआत उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर की और कई फिल्मों में बिना नाम के छोटे रोल किए। उन्हें कैमरे के पास रहने की इतनी चाह थी कि वह स्टूडियो में स्पॉटबॉय या सफाईकर्मी की नौकरी करने के लिए भी तैयार थे।

सुपरस्टार्स को भी देते थे टक्कर

महमूद की कॉमिक टाइमिंग इतनी शानदार होती थी कि बड़े-बड़े हीरो उनके सामने फीके पड़ जाते थे। ऐसा कहा जाता है कि कुछ हीरो तो ऐसी फिल्मों को करने से बचते थे जिसमें महमूद की प्रमुख भूमिका हो। धर्मेंद्र ने एक बार कहा था, “ये वो कॉमेडियन है जिससे हीरो भी डरता था।”

अमिताभ बच्चन के करियर को दी रफ्तार

जब अमिताभ बच्चन अपने करियर के शुरुआती दौर में संघर्ष कर रहे थे और सात हिंदुस्तानी फ्लॉप हो चुकी थी, तब महमूद ने उन्हें ‘बॉम्बे टू गोवा’ फिल्म में लीड रोल दिया। न सिर्फ उन्हें मौका दिया बल्कि उनका मनोबल भी बढ़ाया। महमूद ने अपने क्रू मेंबर्स को भी निर्देश दिया कि बच्चन को सपोर्ट करें और उन्हें कॉन्फिडेंस दें।

विरासत जो कभी धुंधलाई नहीं

23 जुलाई 2004 को महमूद का निधन हो गया, लेकिन उनके किरदार, कॉमिक सीन और फिल्मों का जादू आज भी बरकरार है। उनकी बनाई हुई फिल्मों और निभाए गए किरदारों ने उन्हें सिनेमा की दुनिया में अमर बना दिया है। वे सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि मेहनत, धैर्य और जुनून का प्रतीक हैं।

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