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छत्तीसगढ़ के बलरामपुर में सहकारी बैंक घोटाला: 26 करोड़ की हेराफेरी

Cooperative bank scam in Balrampur, Chhattisgarh: Rs 26 crore embezzled

रिपोर्टर – सुनील कुमार ठाकुर

11 गिरफ्तार, एक फरार

छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में सामने आया सहकारी बैंक घोटाला धीरे-धीरे बड़ा रूप लेता जा रहा है। अम्बिकापुर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की कुसमी और शंकरगढ़ शाखा में फर्जी खातों के जरिए 26 करोड़ रुपये से अधिक की हेराफेरी की गई है। मामले में अब तक 11 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है, जबकि एक आरोपी अभी भी फरार है।

अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से हुआ बड़ा फर्जीवाड़ा

जांच में सामने आया है कि बैंक के अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कई नकली बैंक खाते खोले गए। इन खातों के जरिए गरीब किसानों और शासकीय योजनाओं के नाम पर पैसे निकाले गए और उन्हें निजी खातों में ट्रांसफर किया गया।

KCC खातों से उड़ाए गए करोड़ों रुपये

जांच में यह भी सामने आया है कि फर्जी खातों से केवल किसानों के केसीसी (KCC) खातों से ही नहीं, बल्कि ‘जनपद पंचायत शंकरगढ़’ और ‘नरेगा धनेशपुर’ के नाम से भी खाते खोलकर पैसे गबन किए गए। इस तरह कुल ₹26 करोड़ 47 लाख रुपये की हेराफेरी की गई।

गिरफ्तार किए गए 11 आरोपियों में बैंक कर्मचारी, शाखा प्रबंधक, सहायक लेखापाल और कंप्यूटर ऑपरेटर तक शामिल हैं। सभी को न्यायिक रिमांड पर जेल भेजा गया है।

बैंक ऑडिट और KYC प्रक्रिया पर उठे सवाल

बड़ी बात यह है कि जिन खातों से पैसे निकाले गए वे 12 सालों से एक्टिव थे। जबकि बैंक में हर साल ऑडिट होता है और RBI की ओर से KYC अपडेट करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद यह घोटाला लंबे समय तक छुपा रहा, जिससे बैंकिंग व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

ऑडिट रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि कई खातों में बिना KYC, वाउचर या किसी अधिकृत दस्तावेज के करोड़ों रुपये का लेन-देन किया गया।

पुलिस जांच जारी, कई फर्जी खातों की और जांच संभावित

इस पूरे मामले की जांच पुलिस महानिरीक्षक दीपक झा और एसपी वैभव बैंकर के निर्देशन में की जा रही है। पुलिस अब भी कई फर्जी खातों और अन्य संदिग्धों की जांच में जुटी हुई है।

IPC की गंभीर धाराएं लगाई गईं

आरोपियों पर धारा 409 (विश्वास भंग), 420 (धोखाधड़ी), 467, 468, 471 (जालसाजी), 120B (षड्यंत्र) और 34 (साझा अपराध) के तहत मामला दर्ज किया गया है।

अब सवाल उठते हैं…

क्या यह घोटाला केवल एक शाखा तक सीमित है या पूरे बैंकिंग सिस्टम में ऐसी गड़बड़ियां फैली हुई हैं?

कैसे 12 साल तक ये खाते सक्रिय रहे और किसी अधिकारी की नजर में नहीं आए?

क्या ऑडिटिंग प्रक्रिया भी इस घोटाले में मिलीभगत का हिस्सा रही?

इस घोटाले ने न केवल बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि गरीब किसानों और शासकीय योजनाओं की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। अब देखना यह होगा कि जांच किस दिशा में जाती है और क्या इस घोटाले की जड़ तक पहुंचा जा सकेगा?

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