क्या फारूक अब्दुल्ला ने गुपचुप समर्थन किया था अनुच्छेद 370 हटाने का? पूर्व RAW चीफ के दावे से मचा बवाल

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फारूक अब्दुल्ला

नमस्कार दोस्तों, आज हम बात करेंगे एक ऐसे दावे की, जिसने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हलचल मचा दी है। देश की खुफिया एजेंसी RAW (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) के पूर्व प्रमुख ए.एस. दुलत ने अपनी नई किताब “The Chief Minister and the Spy” में एक ऐसा बयान दिया है, जिसने पुराने राजनीतिक रिश्तों और मौजूदा बयानबाज़ियों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

किताब में क्या कहा गया है?

दुलत का दावा है कि फारूक अब्दुल्ला, जो जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता हैं, ने गुपचुप तरीके से अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया था। हालांकि पब्लिकली उन्होंने इसका विरोध किया।
दुलत ने लिखा है कि फारूक अब्दुल्ला ने उनसे कहा था –

“हमें भरोसे में क्यों नहीं लिया गया? हम मदद करते।”

इस दावे से एक बहुत बड़ा सवाल उठता है – क्या सार्वजनिक बयान और बंद कमरे में की गई बातचीत में बड़ा फर्क था?

फारूक अब्दुल्ला का जवाब

फारूक अब्दुल्ला ने इन दावों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे “सस्ती पब्लिसिटी स्टंट” बताया और कहा कि ये सारी बातें लेखक की कल्पना हैं।
उनका कहना है कि अगर वो अनुच्छेद 370 हटाने के पक्ष में होते, तो उन्हें और उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को अगस्त 2019 में 7 महीने के लिए नजरबंद क्यों किया गया?

गुपकार गठबंधन और राजनीति

आपको याद होगा कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद फारूक अब्दुल्ला ने सभी विपक्षी दलों को साथ लाकर गुपकार गठबंधन बनाया था। इस गठबंधन का मुख्य मकसद था – जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा फिर से बहाल कराना। ऐसे में दुलत के दावे को लेकर सवाल उठना लाज़मी है।

फारूक अब्दुल्ला

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं

इस दावे के सामने आने के बाद कश्मीर की राजनीति में भूचाल आ गया है।
सज्जाद लोन ने सोशल मीडिया पर कहा कि अगर दुलत साहब जैसा करीबी व्यक्ति ये कह रहा है, तो इसकी विश्वसनीयता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
वहीं, पीडीपी की इल्तिजा मुफ्ती ने कहा कि ये एक “बड़ा धोखा” था, और अब सच सामने आ रहा है।

असल सवाल

अब असली सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ एक किताब बेचने की रणनीति है? या फिर देश की राजनीति के उस हिस्से की झलक है जो कभी जनता के सामने नहीं आती?


निष्कर्ष:
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर ये दिखा दिया कि भारतीय राजनीति में सार्वजनिक बयान और पर्दे के पीछे की रणनीतियों में बड़ा अंतर हो सकता है। क्या फारूक अब्दुल्ला ने दोहरी भूमिका निभाई? या ये सब महज एक काल्पनिक कहानी है? इसका जवाब शायद हमेशा सवालों में ही छिपा रहेगा।

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