अंतागढ़ का डूवाल गांव: विकास से कोसों दूर, सड़क नहीं, सुविधाएं नहीं

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Duwal village of Antagarh: Far from development, no road, no facilities

नियति मान कर जी रहे ग्रामीण

रिपोर्टर: जावेद खान | स्थान: अंतागढ़

इक्कीसवीं सदी में जब देश डिजिटल इंडिया की ओर बढ़ रहा है, तब भी छत्तीसगढ़ के कई गांव ऐसे हैं जो बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। कांकेर जिले के अंतागढ़ ब्लॉक के अंतिम छोर पर स्थित तुमसनार पंचायत के आश्रित गांव डूवाल की तस्वीर विकास के तमाम दावों की पोल खोलती है।

सड़क नहीं, तो सुविधाएं भी नहीं

डूवाल गांव चारों ओर से पहाड़ों से घिरा है और यहां तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। गांव तक केवल एक कच्ची, पथरीली सड़क है जिसे गांववासियों ने खुद अपने मेहनत से बनाया है। इसी संकरी पगडंडी से बमुश्किल मोटरसाइकिल ही पहुंच पाती है। इस स्थिति में यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि एम्बुलेंस जैसी जरूरी सेवाएं कैसे इस गांव तक पहुंचती होंगी। ग्रामीणों ने बताया कि आपातकालीन स्थिति में मरीजों को कांवड़ में उठाकर 4 किलोमीटर दूर अड़ेंगा गांव तक ले जाना पड़ता है।

शिक्षा की हालत बदहाल

गांव में एकमात्र प्राथमिक शाला है, जो कि ग्रामीणों द्वारा वैकल्पिक तौर पर बनाई गई है। कक्षा 5 तक की पढ़ाई के बाद बच्चे आगे नहीं पढ़ पाते, क्योंकि पास में कोई माध्यमिक या उच्च माध्यमिक विद्यालय नहीं है। गांव में शायद ही कोई बच्चा 8वीं के आगे पढ़ पाया हो। दूरस्थ विद्यालयों की दूरी, रास्ते की दुर्गमता और संसाधनों की कमी के चलते अधिकांश बच्चे पढ़ाई छोड़कर स्थानीय रोजगार से जुड़ जाते हैं।

स्वास्थ्य और जल व्यवस्था

गांव में एक मात्र सरकारी भवन आंगनबाड़ी केंद्र के रूप में मौजूद है। महिला एवं बाल विकास विभाग की योजनाएं जैसे महतारी वंदन योजना का लाभ ग्रामीण महिलाओं को मिल रहा है। जल जीवन मिशन के अंतर्गत लगी पानी की टंकी कुछ घरों तक पानी पहुंचा रही है, जबकि कुछ घर आज भी इससे वंचित हैं। इस मुद्दे पर लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) के एसडीओ को अवगत करवा दिया गया है और त्वरित निराकरण का आश्वासन मिला है।

बारिश में बनता है ‘टापू’

बरसात के समय यह गांव पूरी तरह अलग-थलग हो जाता है। पहाड़, उफनती नदियां और कीचड़भरे रास्ते इस गांव को बाहरी दुनिया से काट देते हैं। ग्रामीणों को मानसून से पहले राशन सामग्री का स्टॉक करना पड़ता है, क्योंकि बरसात में गांव पहुंचना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

जनप्रतिनिधियों की बेरुखी

ग्रामीणों का कहना है कि आज तक किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस गांव की सुध नहीं ली। न कोई दौरा, न कोई स्थायी समाधान। निराश ग्रामीण अब हालात को अपनी नियति मानकर जीने को मजबूर हैं।

जिला पंचायत सदस्य की मौजूदगी

स्वदेश न्यूज की टीम जब गांव पहुंची, तो नव निर्वाचित जिला पंचायत सदस्य गुप्तेश उसेंडी भी वहां मौजूद थे। उन्होंने समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए शासन-प्रशासन तक इन मुद्दों को पहुंचाने का भरोसा दिलाया।

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