Bhopal vs Indore : भोपाल में मेट्रो की ‘कछुआ चाल’ बनाम इंदौर की ‘हाईस्पीड’: जानिए क्यों पिछड़ गई राजधानी?

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Bhopal vs Indore : एक साथ शुरू हुआ था सफर, लेकिन इंदौर में इसी महीने दौड़ेगी मेट्रो तो भोपाल को करना होगा 2 साल का लंबा इंतजार।

Bhopal vs Indore : मध्य प्रदेश के दो सबसे बड़े और प्रमुख शहरों की विकास यात्रा में इस समय एक बिल्कुल जुदा कहानी देखने को मिल रही है। साल 2019 में एक ही समय पर शुरू हुए भोपाल और इंदौर मेट्रो प्रोजेक्ट्स आज दो अलग-अलग छोर पर खड़े हैं। एक तरफ जहां मिनी मुंबई कहा जाने वाला इंदौर अपने पहले फेज के कमर्शियल ऑपरेशंस (व्यावसायिक संचालन) के लिए पूरी तरह तैयार है, वहीं झीलों की नगरी भोपाल में मेट्रो की रफ्तार बेहद सुस्त पड़ी है।

Bhopal vs Indore

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Bhopal vs Indore : इंदौर ने मारी बाजी, भोपाल 7 किमी में सिमटा

आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि इंदौर मेट्रो ने इस रेस में भोपाल को काफी पीछे छोड़ दिया है। इंदौर ने करीब 17 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर पर अपना ट्रायल रन सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है और इसी महीने से आम जनता के लिए इसकी शुरुआत होने जा रही है। इसके विपरीत, राजधानी भोपाल में मेट्रो परियोजना प्राथमिकता वाले (Priority Corridor) महज 7 किलोमीटर के दायरे में ही सिमट कर रह गई है।

Bhopal vs Indore : भोपाल मेट्रो की लेटीफीफी की असली वजह क्या है?

प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, दोनों शहरों के काम करने के तरीके में बड़ा अंतर था। इंदौर ने शुरुआत से ही कॉन्ट्रैक्ट्स (ठेकों) और जमीनी काम के निष्पादन को सही और पेशेवर तरीके से संभाला, जिससे उनका प्रोजेक्ट कभी पटरी से नहीं उतरा।

वहीं, भोपाल मेट्रो के पिछड़ने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण सामने आए हैं :

टुकड़ों में ठेके देना : काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटने से गति धीमी हुई
ठेकेदारों के आपसी विवाद : कंपनियों के बीच तालमेल की कमी और कानूनी उलझनों ने काम रोका
सरकारी एजेंसियों में समन्वय की कमी : विभिन्न विभागों से समय पर क्लीयरेंस न मिलना

फिलहाल भोपाल के मध्य और उपनगरीय इलाकों में एलिवेटेड और अंडरग्राउंड सेक्शन का काम अधूरा है, जिसे पूरा होने में कम से कम दो साल और लग सकते हैं।

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मेट्रो के काम में हो रही इस देरी का सीधा और दर्दनाक असर भोपाल की जनता और स्थानीय व्यापारियों पर पड़ रहा है। सड़कों पर लगी लंबी बैरिकेडिंग ने बाजारों की रौनक छीन ली है। सिंधी कॉलोनी के एक स्थानीय दुकानदार का कहना है, “हमसे वादा किया गया था कि मेट्रो का काम एक साल में पूरा हो जाएगा, लेकिन सालों बाद भी यहां सिर्फ बैरिकेड्स और धूल ही दिखती है। हमारा रोज का धंधा चौपट हो चुका है।”

इसके अलावा, शहर में मजबूत पब्लिक ट्रांसपोर्ट न होने के कारण कामकाजी लोगों को रोजाना भारी ट्रैफिक जाम और मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ रहा है।

Bhopal vs Indore : भोपाल और इंदौर मेट्रो : एक नजर में अंतर

पैमाना इंदौर मेट्रो भोपाल मेट्रो

काम की शुरुआत :

इंदौर मेट्रो: साल 2019

भोपाल मेट्रो : साल 2019

वर्तमान स्थिति :

इंदौर मेट्रो : 17 किलोमीटर (कॉरिडोर पूरी तरह तैयार है)

भोपाल मेट्रो : 7 किलोमीटर (सिर्फ प्रायोरिटी कॉरिडोर ही तैयार हो पाया है)

कमर्शियल स्टेटस (व्यावसायिक संचालन):

इंदौर मेट्रो : इसी महीने से आम जनता के लिए संचालन शुरू होने जा रहा है।

भोपाल मेट्रो : बाकी हिस्से अभी भी अधूरे हैं, जिससे लगभग 2 साल की देरी की आशंका है।

सफलता और विफलता की बड़ी वजह:

इंदौर मेट्रो : शुरुआत से ही सही समय पर कॉन्ट्रैक्ट्स का होना और सुचारू मैनेजमेंट (प्रबंधन)।

भोपाल मेट्रो : काम को टुकड़ों में ठेके पर देना, ठेकेदारों के आपसी विवाद और सरकारी एजेंसियों में समन्वय की कमी।

आम जनता पर असर :

इंदौर मेट्रो : सफर आसान होगा, ट्रैफिक से निजात मिलेगी और समय की बड़ी बचत होगी।

भोपाल मेट्रो : निर्माण कार्य खिंचने से शहर में भारी ट्रैफिक जाम, स्थानीय व्यापार का नुकसान और नागरिकों को मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है।

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शहरी नियोजन के विशेषज्ञों का मानना है कि भोपाल मेट्रो को इस भंवर से निकालने के लिए राज्य सरकार को अब युद्ध स्तर पर कुछ कड़े कदम उठाने होंगे :

फास्ट-ट्रैक मंजूरियां : प्रशासनिक और सरकारी विभागों से मिलने वाली मंजूरियों में तेजी लाई जाए।
टेंडर्स का पुनर्मूल्यांकन : जो टेंडर पैकेज अटके हुए हैं, उनकी समीक्षा कर नए सिरे से काम आवंटित हो।
टार्गेटेड फंडिंग : प्रोजेक्ट के रुके हुए हिस्सों के लिए विशेष रूप से फंड जारी किया जाए।

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