BY
Yoganand Shrivastava
Kushinagar कुशीनगर की रहने वाली 20 वर्षीय युवती को 19 जनवरी को गंभीर हालत में गोरखपुर एम्स लाया गया था। युवती ने जहरीला पदार्थ (फॉस्फोरस) खा लिया था। इलाज के दौरान जब युवती की स्थिति बिगड़ी और उसे आईसीयू में शिफ्ट किया गया, तो उसके परिजन पुलिस केस के डर और उसे मृत समझकर अस्पताल में ही छोड़कर भाग गए। लेकिन एम्स के डॉक्टरों ने हार मानने के बजाय उसे अपनी जिम्मेदारी समझा।

Kushinagar चुनौतियों भरा सफर: 48 दिन वेंटिलेटर और 3 बार हार्ट अटैक
युवती की जान बचाना डॉक्टरों के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था। इलाज के दौरान उसे तीन बार दिल का दौरा (Cardiac Arrest) पड़ा, लेकिन हर बार डॉक्टरों ने सीपीआर (CPR) देकर उसे मौत के मुंह से खींच निकाला।

- वेंटिलेटर सपोर्ट: युवती लगातार 48 दिनों तक वेंटिलेटर पर रही।
- विशेषज्ञों की टीम: डॉ. अरविंद कुमार, डॉ. सुहास मल्ल और डॉ. अरुण कुमार पांडेय सहित डॉ. सुब्रमणियम, डॉ. अनिल मीना, डॉ. शशि सिंह और डॉ. श्रीशा की टीम ने दिन-रात उसकी निगरानी की।
Kushinagar एम्स प्रशासन और डॉक्टरों ने उठाया पूरा खर्च
चूंकि युवती के परिजन उसे छोड़कर चले गए थे, उसके पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। ऐसे में एम्स प्रशासन और डॉक्टरों ने मिलकर इलाज, दवाइयों और देखभाल का सारा खर्च वहन किया। डॉक्टरों का कहना था कि उनका एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर उस मासूम की जान बचाना था। मानवता के इस सामूहिक प्रयास ने 98 दिनों के संघर्ष के बाद रंग दिखाया।

Kushinagar घर वापसी: डर से भागे परिजनों को मिला ‘नया जीवन’
98 दिनों के लंबे उपचार के बाद जब युवती पूरी तरह स्वस्थ हो गई, तो उसे 26 अप्रैल को डिस्चार्ज किया गया। जब उसके परिजनों से संपर्क किया गया और वे उसे लेने पहुंचे, तो उन्होंने बताया कि वे जहरीला पदार्थ खाने के कारण कानूनी कार्रवाई और मौत की आशंका से डरकर भाग गए थे। अपनी बेटी को दोबारा जीवित और स्वस्थ पाकर परिजनों की आंखों में आंसू और डॉक्टरों के प्रति आभार था।





