Vijay Nandan (वरिष्ठ पत्रकार और डिजिटल एडिटर)
बिहार के चुनावी महासंग्राम का आखिरकार पटाक्षेप हो गया है और तस्वीर बिल्कुल साफ है। बिहार की जनता ने एक बार फिर कमान एनडीए के हाथों में सौंपने का जनादेश दिया है। रूझानों के नतीजों में बदलने की भारी बढ़त ने ये तय कर दिया है कि सत्ता की कुर्सी एनडीए ही संभालेगा। उधर महागठबंधन के सपने बिखर चुके हैं, तेजस्वी यादव के छलांग मारते दावे हों या राहुल गांधी के बड़े-बड़े वादे… वोट चोरी के आरोप, हर घर से एक सदस्य को नौकरी, महिलाओं को 30 हज़ार रुपये की मदद, जैसे सभी मुद्दे नतीजों की आँधी में उड़ गए। जनता ने बता दिया कि सुशासन और विकास की हवा किस तरह बह रही थी और हवा किसकी निकली। अब सवाल सिर्फ इतना है कि सत्ता की कुर्सी पर कौन बैठेगा, क्या एक बार फिर नीतीश कुमार ही बिहार का नेतृत्व करते दिखाई देंगे या एनडीए कोई नया चेहरा सामने लाने जा रहा है?

उधर बिहार का जातिगत गणित भी इस बार राजनीति के पंडितों की नहीं, जनता की मर्ज़ी से तय हुआ। प्रशांत किशोर के डेटा का सारा हिसाब–किताब धरा का धरा रह गया। लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की पार्टी तो छोड़िए खुद की सीट संकट में घिरी दिख रही है । यह नतीजे साफ बताते हैं कि इस चुनाव में न समीकरण चले, न जातीय जोड़तोड़ चला, सिर्फ मोदी फैक्टर की आंधी और नीतीश कुमार की स्थिर, अनुभवी छवि का जादू कमाल कर गया। इन दोनों की संयुक्त पकड़ ऐसी रही कि विपक्ष के सारे दावे, सारे मुद्दे और सारे वादे हवा में उड़ते नज़र आए। जनता ने बहुत साफ संदेश दिया है, कथनी नहीं, करनी देखने का वक्त है और भरोसा उसी पर है जो काम के दम पर खड़ा हो सके।






