6 मई 2010: जब अजमल कसाब को सुनाई गई थी फांसी की सजा, पाकिस्तान को मिला करारा जवाब

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BY: Yoganand Shrivastava

भारत के इतिहास में 26/11 मुंबई आतंकी हमला एक ऐसा दर्दनाक अध्याय है जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। इस हमले में शामिल इकलौते ज़िंदा पकड़े गए आतंकी अजमल आमिर कसाब को आज ही के दिन, 6 मई 2010, को विशेष अदालत ने मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। यह फैसला आतंकवाद के खिलाफ भारत की कड़ी कार्रवाई और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को खुली चुनौती था।

पहलगाम हमला और 26/11 की यादें

हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने 26 निर्दोष नागरिकों की जान ले ली, जिनमें अधिकांश पर्यटक थे। इसने एक बार फिर 2008 के मुंबई हमले की भयावहता की यादें ताज़ा कर दीं। उस हमले में पाकिस्तान से समुद्र मार्ग से आए 10 आतंकियों ने भारत की आर्थिक राजधानी को निशाना बनाया था। उनमें से एक, अजमल कसाब, मुंबई पुलिस के हाथों 27 नवंबर 2008 को ज़िंदा पकड़ा गया था।

समुद्र के रास्ते आया था आतंक

26 नवंबर 2008 को आतंकियों ने समुद्र के रास्ते मुंबई में घुसपैठ की। उन्होंने छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (CST), ताज होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट, नरीमन हाउस और लियोपोल्ड कैफे जैसे प्रमुख स्थानों को निशाना बनाया। कसाब और उसके साथी अबू इस्माइल ने CST स्टेशन पर अंधाधुंध फायरिंग कर 59 लोगों की जान ली

कैमरों में कैद हुआ था मौत का मंजर

उनकी बंदूक से निकली गोलियां, और वायरल हुए वीडियो व तस्वीरें, पूरी दुनिया के लिए चेतावनी बन गईं। आतंकियों ने सैकड़ों लोगों को बंधक बनाया और तीन दिनों तक चली इस घातक कार्रवाई में 9 आतंकी मारे गए, जबकि कसाब पुलिस द्वारा जिंदा पकड़ लिया गया। इस दौरान मुंबई पुलिस के तुकाराम ओंबले शहीद हो गए।

पाकिस्तान कनेक्शन और कबूलनामा

पूछताछ में कसाब ने स्वीकार किया कि वह पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के फरीदकोट गांव का निवासी था और उसे लश्कर-ए-तैयबा ने प्रशिक्षण दिया था। जांच में पता चला कि इस आतंकी हमले की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी।

86 गंभीर आरोप, 11 हजार पन्नों की चार्जशीट

विशेष अदालत में कसाब के खिलाफ 86 संगीन आरोप लगाए गए, जिसमें हत्या, आतंकवाद और राष्ट्र के खिलाफ युद्ध जैसी धाराएं शामिल थीं। इस पर आधारित 11,000 पन्नों की चार्जशीट पेश की गई थी। मई 2010 में कोर्ट ने उसे दोषी ठहराया और 6 मई को फांसी की सजा सुनाई गई।

उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली राहत

कसाब ने सजा के खिलाफ हाई कोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन दोनों अदालतों ने उसकी सजा को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कसाब ने अपने किए पर कभी पछतावा नहीं जताया और खुद को ‘पाकिस्तानी राष्ट्रभक्त’ मानता रहा।

गोपनीय ऑपरेशन ‘X’ और अंतिम सजा

कसाब ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल की, लेकिन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद 21 नवंबर 2012 को पुणे की यरवदा जेल में कसाब को फांसी दी गई। इस पूरी प्रक्रिया को ‘ऑपरेशन एक्स’ नाम दिया गया, जो पूरी तरह गुप्त रखा गया था

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