2 अप्रैल 2025, नई दिल्ली
लोकसभा में आज वक़्फ़ संशोधन बिल, 2025 पर हो रही बहस ने राजनीतिक गर्मागर्मी पैदा कर दी। केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने यूपीए सरकार पर जमकर हमला बोला, जबकि विपक्ष ने इसे “संविधान पर हमला” बताया।
वक़्फ़ बिल क्या है?
- वक़्फ़ इस्लामिक कानून के तहत धार्मिक या पुण्य के काम के लिए दान की गई संपत्ति को कहते हैं
- नए बिल में वक़्फ़ संपत्तियों के प्रबंधन और नियंत्रण में बड़े बदलाव प्रस्तावित हैं
- सरकार का दावा है कि यह पारदर्शिता बढ़ाएगा और गलत इस्तेमाल रोकेगा
- विपक्ष का आरोप – यह मुस्लिम अधिकारों में दखल है
रिजिजू का तीखा हमला
बहस के दौरान किरेन रिजिजू ने कांग्रेस को निशाने पर लेते हुए कहा:
“2004-2014 के दौरान कांग्रेस ने वक़्फ़ संपत्तियों को लूटने का खेल खेला। अगर वे आज सत्ता में होते, तो संसद भवन को भी वक़्फ़ घोषित कर देते!”
उन्होंने दिल्ली के 123 एकड़ वक़्फ़ जमीन के घोटाले का उदाहरण देते हुए कहा कि नया कानून ऐसे घोटालों को रोकेगा।
विपक्ष की आपत्तियाँ
अखिलेश यादव (सपा):
“भाजपा को जमीन की भूख है। पहले जंगल, अब वक़्फ़ जमीन पर नजर है!”
असदुद्दीन ओवैसी (एआईएमआईएम):
“यह बिल मुस्लिम पर्सनल लॉ में दखल है। हम सुप्रीम कोर्ट तक लड़ेंगे!”
प्रशांत किशोर:
“मुस्लिम समुदाय में डर फैल रहा है। सरकार को भरोसा बनाना चाहिए, न कि डराना।”
मुस्लिम संगठनों की प्रतिक्रिया
- अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सभी दलों से विरोध करने की अपील की
- जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने इसे “इस्लामी कानून में दखल” बताया
- दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड ने कहा – “यह हमारे धार्मिक अधिकारों पर हमला है”

बिल के प्रमुख प्रावधान
- केंद्र सरकार को वक़्फ़ बोर्डों पर अधिक नियंत्रण
- वक़्फ़ संपत्तियों का डिजिटल डाटाबेस बनाना
- अवैध कब्जे हटाने के लिए विशेष अधिकार
- वक़्फ़ आय के उपयोग पर सख्त निगरानी
आगे की राह
- बहस के बाद कल वोटिंग होनी है
- भाजपा के बहुमत के चलते बिल के पास होने की संभावना
- विपक्ष सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में
- कई मुस्लिम संगठन विरोध प्रदर्शन की योजना बना रहे
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
- योगेंद्र यादव: “यह बिल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति का हिस्सा है”
- रशीद अल्वी: “सरकार को मुस्लिम नेताओं से बातचीत करनी चाहिए थी”
- स्वप्न दासगुप्ता: “वक़्फ़ संपत्तियों में सुधार जरूरी था, लेकिन तरीका गलत है”
निष्कर्ष
यह बहस सिर्फ एक कानून से आगे बढ़कर धर्मनिरपेक्षता बनाम सुधार की बहस बन गई है। जहां सरकार पारदर्शिता की बात कर रही है, वहीं विपक्ष इसे अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला मान रहा है। अगले कुछ दिनों में यह विवाद और गहरा सकता है।