वक्फ संशोधन विधेयक पर संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की बैठक में भारी हंगामा हुआ, जिससे राजनीतिक माहौल और भी गरम हो गया। बैठक के दौरान विपक्षी सांसदों और सत्ताधारी पक्ष के बीच तीखी नारेबाजी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। अंततः इस गतिरोध के कारण 10 विपक्षी सांसदों को एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया, और बैठक स्थगित करनी पड़ी।
हंगामे की शुरुआत और विरोध
समिति की बैठक में हंगामे की शुरुआत उस समय हुई जब विपक्षी दलों के सांसदों ने वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर की। टीएमसी के सांसद कल्याण बनर्जी ने तो इसे अघोषित आपातकाल का रूप देते हुए आरोप लगाया कि बैठक के सभापति बिना किसी की बात सुने ही बैठक को आगे बढ़ा रहे थे। उनका कहना था, “हमें पहले यह बताया गया था कि 24 और 25 जनवरी को बैठक होगी, लेकिन अचानक एजेंडा बदल दिया गया, और यह सब बिना किसी पूर्व सूचना के हुआ।”
निलंबित सांसदों का विरोध
इस हंगामे के बाद 10 विपक्षी सांसदों को एक दिन के लिए निलंबित कर दिया गया। निलंबन की सूची में प्रमुख नामों में टीएमसी के कल्याण बनर्जी और नदीम उल हक, एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी, समाजवादी पार्टी के मोबीबुल्लाह, कांग्रेस के नासिर हुसैन और इमरान मसूद, शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत, और डीएमके के ए राजा व अब्दुल्ला के नाम शामिल हैं। हालांकि, इन सांसदों को केवल आज की बैठक से निलंबित किया गया है, ना कि पूरी समिति से।

स्थिति की गंभीरता और मार्शल का बुलाया जाना
जैसे ही दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस बढ़ी और नारेबाजी का स्तर और ज्यादा चढ़ा, स्थिति अस्थिर हो गई। अंततः मामला इस हद तक बढ़ा कि मार्शल को बुलाने की नौबत आ गई, जिससे बैठक को स्थगित करना पड़ा।
वक्फ विधेयक पर राजनीतिक तनाव
यह घटना यह दर्शाती है कि वक्फ संशोधन विधेयक पर राजनीति का पारा इस समय बहुत उच्चतम स्तर पर है। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह विधेयक उनके विचारों के खिलाफ है और इसके माध्यम से सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा मिल सकता है। वहीं, सत्ताधारी पक्ष इसे एक अहम सुधार और वक्फ संपत्तियों के बेहतर प्रबंधन के लिए जरूरी मानता है।
आगे की राह
यह हंगामा केवल शुरुआत है। वक्फ संशोधन विधेयक पर बहस और विवाद अगले चरणों में और भी बढ़ सकता है, खासकर जब इसे संसद में पेश किया जाएगा। राजनीतिक पंक्ति और विपक्षी दलों के इस विषय पर अलग-अलग दृष्टिकोण हैं, और यही कारण है कि यह मुद्दा आगे भी गर्माता रहेगा।
राजनीतिक दृष्टि से यह एक चुनौतीपूर्ण समय है, और इस विधेयक के परिणामों से देश की धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर भी गहरा असर पड़ सकता है।
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