रिपोर्ट – प्रशांत जोशी
नौकरी और मुआवज़े की मांग को लेकर दी चक्का जाम की चेतावनी
कांकेर ज़िला मुख्यालय में आज एक बार फिर रेलवे और बीएसपी के अधिकारियों के साथ ग्रामीणों की बैठक बुलाई गई, लेकिन वर्षों पुरानी मांगों को लेकर चली यह बैठक भी बेनतीजा रही। इससे नाराज़ ग्रामीणों का गुस्सा एक बार फिर फूट पड़ा।
ग्रामीणों का आरोप है कि साल 2008-09 में रेलवे द्वारा रेल लाइन बिछाने के लिए उनकी ज़मीनें अधिकृत की गई थीं। उस समय रेलवे और बीएसपी के अधिकारियों ने यह वादा किया था कि जिन ग्रामीणों की ज़मीन ली जाएगी, उनके परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाएगी और उचित मुआवज़ा भी प्रदान किया जाएगा। लेकिन 12 से 14 साल बीत जाने के बावजूद न तो नौकरी दी गई और न ही मुआवज़े की पूरी राशि।
हर बार जब ग्रामीण अपनी मांगों को लेकर विरोध करते हैं, रेल लाइन रोकते हैं या बीएसपी की ट्रकों को रास्ते में रोकते हैं, तब नए अधिकारी मीटिंग के नाम पर बुला लेते हैं। लेकिन हर मीटिंग में यही बहाना मिलता है कि “हमने कोई वादा नहीं किया, यह किसी पुराने अधिकारी की बात रही होगी।” या फिर यह कहा जाता है कि “ऐसा कोई नियम नहीं है जिसमें जमीन के बदले नौकरी दी जा सके।”
आज की बैठक में भी कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला। नए अधिकारी आए, पुरानी बातें दोहराईं और कोई समाधान नहीं निकला। इससे नाराज़ ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो वे कल से रेलवे और बीएसपी की ट्रकों का चक्का जाम करेंगे।
ग्रामीणों ने यह भी बताया कि कई परिवार ऐसे हैं जिनकी पूरी आजीविका उन्हीं खेतों पर निर्भर थी जो अब रेलवे लाइन के लिए अधिग्रहित कर ली गई हैं। 4 से 5 एकड़ ज़मीन गंवा चुके कई किसान आज रोज़ी-रोटी के लिए मोहताज हो चुके हैं। न नौकरी मिली, न मुआवज़ा, और अब उनका सब्र जवाब दे रहा है।
धोबापारा, रावघाट, कूलर, पुलपाड़, लामपुरी, अन्तागढ़ और अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में ग्रामीण आज की बैठक में शामिल हुए। सभी की मांग एक ही थी — न्याय मिले, वादा पूरा हो।
अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या प्रशासन और संबंधित विभाग ग्रामीणों की वर्षों पुरानी मांगों को गंभीरता से लेकर कोई ठोस निर्णय लेते हैं या यह संघर्ष और लंबा खिंचता है।





