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- फिर विक्रमादित्य द ग्रेट क्यों नहीं ?
आज महाशिवरात्रि है…आप सभी को महाशिवरात्रि की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..आज से मध्य प्रदेश में विक्रमोत्सव का आयोजन भी शुरू हो रहा है, ये प्रकल्प सम्राट विक्रमादित्य की महानता को फिर से स्थापित करने और भारतीय अस्मिता को बढ़ावा देने का प्रयास है। लेकिन अब सवाल ये है कि मध्य प्रदेश सरकार ऐसे प्रकल्पों को क्यों बढ़ावा दे रही है।.. कहां कमी रह गई या जानबूझ कर कमी रखी गई। क्या सनातन धर्म से जुड़े महान राजा महाराजाओं को दरकिनार किया गया। सवाल कई हैं.. जिनके जवाब टटोलने की कोशिश इस खास रिपोर्ट की गई है।
जी हां आज हर सनातनी के मन में ये सवाल कौंध रहा है। वो प्रतापी राजा जिसने शकों को हराकर विक्रम संवत युग की शुरुआत की. वो राजा जिसके खगोलीय और ज्योतिषीय ज्ञान पर आधारित पंचांग का एक महत्वपूर्ण कालचक्र है. वो सम्राट जिसको न्यायप्रियता, उदारशीलता और विद्वत्ता के लिए जाना जाता है. वो राजा जिनके दरबार में सबसे महान खगोलशास्त्री और गणितज्ञ वाराहमिहिर, नाटकाकर और कवि कालिदास जैसे नवरत्न थे, वो सम्राट जिनके शासन सिंहासन बत्तीसी की व्यवस्था थी, वो सम्राट जिसने न सिर्फ भारतवर्ष बल्कि पूरे एशिया महाद्वीप में अपने साम्राज्य फैलाया। वो राजा जो आदिशक्ति के परम भक्त थे। वो राजा जो माता हरसिद्धि और माता बगलामुखी के साक्षात दर्शन पाते थे। वो राजा जिनके नाम की 14 भारतीय राजाओं को उपाधि दी गई. वो राजा जिन्हें वीर विक्रम, बिक्रमजीत, सम्राट विक्रमादित्य और विक्रमार्क कहा गया. सवाल यही कि आज उन्हें विक्रमादित्य द ग्रेट क्यों नहीं कहा जाता है।
सम्राट विक्रमादित्य पर इतिहासिक साजिश हुई
चलिए एक रिसर्च के जरिए इस जटिल सवाल का जबाव जानने की कोशिश करते हैं, विक्रमादित्य शासनकाल के थोड़े पहले ग्रीस के हिरोडोटस बड़े इतिहासकार थे, जो हिस्ट्री के जनक भी कहलाए, उन्होंने अपने लेखों में विक्रमादित्य को महान राजा बताया, उसके बाद मध्यकाल तक यानि 11वीं-12वीं सदी में लिखे गए ग्रंथों जैसे भोजप्रबंध और राजतरंगिणी में परोक्ष रूप से विक्रमादित्य की छवि एक आदर्श और महान राजा के रूप में स्थापित थी। लेकिन 13वीं सदी जब भारत में तुर्क और मुगलों का आगमन हुआ, भारत में इतिहास लेखन का स्वरूप बदल गया। मुगलों के दरबारी इतिहासकारों जैसे अल-बिरूनी और अन्य ने समकालीन इस्लामी राजाओं का महिमामंडन किया। प्राचीन हिंदू राजा जैसे विक्रमादित्य और अन्य पर लेखन कम हो गया। उसके बाद अंग्रेज इतिहासकारों ने भी भारतीय इतिहास को पश्चिमी ढांचे में ढालने की ना सिर्फ कोशिश की बल्कि इस दौर में विक्रमादित्य जैसे पौराणिक-ऐतिहासिक चरित्रों को “मिथक” या “अस्पष्ट” मानकर उनकी महानता को कम किया गया। लेकिन आजादी के पहले 1942 में ही विक्रम महोत्सव की शुरूआत हो गई थी. तब 114 रियासतों ने राजा महाराजा जुटे थे. तब पृथ्वीराज कूपर को लेकर विक्रमादित्य फिल्म का निर्माण भी शुरू हुआ था। जिसकी उन्होंने फीस नहीं ली थी। लेकिन अंग्रेजों को इस धार्मिक आयोजन से क्रांति का खतरा लगा. उधर मोहम्मद अली जिन्ना जैसे मुस्लिम नेताओं को भी हिंदू राजाओं का एकजुट होना रास नहीं आया। यही वजह रही कि ये सिलसिला भारत की आजादी के बाद भी दोहराया गया, इतिहास लेखन और शिक्षा का ढांचा आधुनिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित हो गया, इसके कारण विक्रमतादित्य पर ऐतिहासिक अस्पष्टता बना दी गई, विक्रमादित्य की सटीक पहचान और कार्यों पर विद्वानों में एकमत न होना। धर्मनिरपेक्षता: एक हिंदू राजा को राष्ट्रीय नायक बनाने से बहुधार्मिक भारत में संतुलन बिगड़ने का डर था। तब सरकार के पास आधुनिक प्राथमिकताएँ थी, तब स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारत के निर्माण को प्राचीन राजाओं से ज्यादा महत्व दिया गया। आजादी के बाद जिनके हाथ में भारत की बागडोर आई उन्हें लोककथाओं पर आधारित चरित्र को राष्ट्रीय उत्सव का आधार बनाने में संकोच भी था।

इसलिए भुला दिए गए विक्रमादित्य
- भारत में तुर्क और मुगलों का आगमन
- भारत में इतिहास लेखन का स्वरूप बदल गया
- मुगलों के दरबारी इतिहासकारों ने इस्लामी राजाओं का महिमामंडन शुरू किया
- विक्रमादित्य और अन्य राजाओं पर लेखन कम हो गया
- ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को पश्चिमी ढांचे में ढाला
- विक्रमादित्य जैसे चरित्रों को “मिथक” या “अस्पष्ट” बताना
- 1942 में विक्रम महोत्सव की हुई थी शुरूआत
- 114 रियासतों ने राजा महाराजा एकजुट हुए थे
- पृथ्वीराज कूपर को लेकर विक्रमादित्य फिल्म का निर्माण हुआ
- अंग्रेजों को धार्मिक आयोजन रास नहीं आया, क्रांति का खतरा था
- मो. अली जिन्ना को हिंदू राजाओं का एकजुट होना पसंद नहीं आया
- भारत की आजादी के बाद भी यही दोहराया गया
- इतिहास लेखन आधुनिक दृष्टिकोण पर आधारित रहा
- विक्रमादित्य पर ऐतिहासिक अस्पष्टता बना दी गई
- विक्रमादित्य पर विद्वानों का एकमत न होना
- हिंदू राजाओं को राष्ट्रीय नायक बनाने में धर्मनिरपेक्षता आड़े आई
- स्वतंत्रता संग्राम और आधुनिक भारत के निर्माताओं को प्राथमिकता दी
- लोककथाओं के चरित्रों को राष्ट्रीय उत्सव का आधार बनाने में संकोच होना
लेकिन अब मध्य प्रदेश सरकार राजा विक्रमादित्य की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को पुनस्थापित करने विक्रमोत्सव का आयोजन कर रही है। 2009 में महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ की स्थापना की गई, इसकी स्थापना में सीएम डॉ मोहन यादव का बड़ा योगदान रहा। इसके तत्वाधान में ही विक्रमोत्सव का आयोजन होता है, ये प्रकल्प उनकी महानता को फिर से स्थापित करने और भारतीय अस्मिता को बढ़ावा देने का एक प्रयास है। यह आयोजन 26 फरवरी 2025 यानि महाशिवरात्रि से शुरू होकर 30 जून 2025 तक 125 दिनों तक चलेगा। इस दौरान विभिन्न कार्यक्रमों होंगे। इनमें सम्राट विक्रमादित्य के योगदान, भारतीय संस्कृति, विज्ञान, और विकास की झलक प्रस्तुत की जाएगी।
विक्रमोत्सव 2025 के प्रमुख कार्यक्रम
- विक्रमोत्सव का शुभारंभ: महाशिवरात्रि, 26 फरवरी 2025
- उज्जैन में भव्य कलश का आयोजन
- महाकाल की पूजा के बाद शिवार्चन महोत्सव शुरू
- भारतीय काल गणना पर आधारित वैदिक घड़ी ‘ऐप‘ का शुभारंभ
- 84 महादेव प्रदर्शनी: शिव के 84 रूपों को दर्शाती विशेष प्रदर्शनी
- सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ: मशहूर कलाकारों द्वारा प्रस्तुतियां
- साहित्यिक गोष्ठियाँ, विभिन्न बोलियों में कवि सम्मेलन
- जनजातीय संस्कृति पर आधारित नृत्य, संगीत का प्रदर्शन
- क्षेत्रीय व पौराणिक फिल्मों का प्रदर्शन
- विक्रम व्यापार मेला में हस्तशिल्प, पारंपरिक व्यंजन
- वस्त्रोद्योग, और हथकरघा उपकरणों की प्रदर्शनी
- शोधपरक पुस्तकों और ग्रंथों का लोकार्पण
- विक्रम संवत पर आधारित पंचांग का विमोचन
- सम्राट विक्रमादित्य केंद्रित प्रदर्शनियाँ
- ऋषि-वैज्ञानिक परंपरा और देवी अहिल्याबाई पर केंद्रित प्रदर्शनी
- उज्जैन के साथ अन्य स्थानों पर भी ऐतिहासिक प्रदर्शनियाँ
- सिंहस्थ 2028 की अवधारणा का लोकार्पण
कुल मिलाकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में ये उत्सव सम्राट विक्रमादित्य के बहुआयामी व्यक्तित्व को जन-जन तक पहुँचाने और उनकी महानता को फिर से जीवंत करने के लिए आयोजित किया जा रहा है। यह सनातन संस्कृति और भारतीय विरासत को वैश्विक मंच पर ले जाने का प्रयास है और इसी प्रयास में विकास भी है।
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