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सराईटोला: जंगल कटाई को लेकर ग्रामीणों में आक्रोश

Saraitola: Villagers are angry over deforestation

रायगढ़, छत्तीसगढ़ – रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक के ग्राम पंचायत सराईटोला में हाल ही में जंगल की कटाई को लेकर चल रहे विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। जांच में सामने आया है कि जंगल काटने के लिए जो पर्यावरणीय स्वीकृति दी गई, वह फर्जी ग्राम सभा के आधार पर प्राप्त की गई थी। यह मामला न सिर्फ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि आदिवासी समुदाय के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन की ओर भी इशारा करता है।

बिना तिथि, बिना सहमति, बिना अधिकारी – ग्राम सभा का फर्जीवाड़ा

जिस दस्तावेज के आधार पर जंगल काटने की अनुमति दी गई, उसमें न तो ग्राम सभा की तिथि दर्ज है और न ही उस दिन ग्राम सभा आयोजित होने के कोई ठोस प्रमाण हैं। दस्तावेजों में जयशंकर राठिया को ग्राम सभा का अध्यक्ष बताया गया है, लेकिन ग्रामीणों और जांच के अनुसार इस नाम का कोई व्यक्ति पंचायत में मौजूद ही नहीं है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि—

  • ग्राम सभा में कलेक्टर प्रतिनिधि की उपस्थिति का कोई जिक्र नहीं है
  • न ही फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी की गई
  • वन विभाग का कोई नुमाइंदा भी मौके पर मौजूद नहीं था

इन सभी बातों से यह स्पष्ट होता है कि ग्राम सभा कागजों में गढ़ी गई और इसे एक औपचारिकता के रूप में इस्तेमाल कर जंगल काटने की मंजूरी प्राप्त कर ली गई।

जंगल कटने से सबसे अधिक नुकसान आदिवासियों को

सराईटोला क्षेत्र के जंगल वहां के आदिवासी समुदाय की आजीविका और जीवनशैली का मूल आधार हैं। यहां के लोग जंगलों से मिलने वाले संसाधनों जैसे—

  • महुआ, तेंदूपत्ता, सरई बीज
  • भाजी, मसरूम, करील
  • जड़ी-बूटियां और वन्य फल

से अपनी खाद्य सुरक्षा और घरेलू जरूरतें पूरी करते हैं। इसके अलावा वे नदी से मछली, केकड़ा, घोंघा पकड़ते हैं और पशुपालन के माध्यम से जीवन यापन करते हैं।

जंगल कटने से ये सभी संसाधन खत्म हो जाते हैं, जिससे भुखमरी, बेरोजगारी और विस्थापन की स्थिति उत्पन्न होती है।

विकास बनाम विनाश: कौन जिम्मेदार?

विकास के नाम पर कोयला, बॉक्साइट और लौह अयस्क जैसे खनिजों की खुदाई के लिए जब जंगलों की कटाई होती है, तो सबसे पहले आदिवासी ही प्रभावित होते हैं

  • उनकी रोज़गार की व्यवस्था टूटती है
  • स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुँच कम होती है
  • परंपरा, संस्कृति और पहचान खतरे में पड़ जाती है

कानून हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और

सरकार भले ही पेसा कानून, वन अधिकार अधिनियम, मनरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून जैसे अधिकारों की बात करती हो, लेकिन जब जमीन पर इन कानूनों को लागू करने की बात आती है, तो ये सभी कागजों में सिमट कर रह जाते हैं

  • फर्जी ग्राम सभा की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए
  • पर्यावरणीय मंजूरी को रद्द किया जाए
  • और भविष्य में किसी भी वन क्षेत्र में कार्य से पहले स्थानीय समुदाय की सहमति अनिवार्य की जाए

सराईटोला की यह लड़ाई जल, जंगल और जमीन को बचाने की है—जो सिर्फ आदिवासियों की नहीं, हम सभी की जिम्मेदारी है।

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