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34 साल बाद पुलिस कांस्टेबल को मिला न्याय: ग्वालियर हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

BY: Yoganand Shrivastava

ग्वालियर: हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी को आपराधिक मामले में बरी होने के बाद बिना विभागीय जांच के नौकरी से हटाया नहीं जा सकता। यह फैसला पुलिस विभाग के पूर्व कांस्टेबल राधारमण मिश्रा के मामले में सुनाया गया, जिन्होंने 34 साल तक न्याय के लिए संघर्ष किया।

मामला: हत्या और लूट का आरोप

राधारमण मिश्रा ने 1976 में पुलिस विभाग में कांस्टेबल के रूप में सेवा शुरू की थी। 1988 में उन पर हत्या और लूट का आरोप लगाया गया। इसके बाद विभाग ने 1989 में उन्हें निलंबित कर दिया और 1996 में सेवा से बर्खास्त कर दिया।

कोर्ट में बरी, फिर भी नौकरी से बाहर

2005 में हाईकोर्ट की युगल पीठ ने सबूतों के अभाव में मिश्रा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बावजूद, विभाग ने 2007 और 2012 में उनके पुनर्स्थापन के आवेदन खारिज कर दिए। इस पर मिश्रा ने फिर से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोर्ट का स्पष्ट संदेश

हाईकोर्ट ने कहा कि सबूतों की कमी के आधार पर बरी होना भी पूर्ण दोषमुक्ति के समान है। ऐसे मामलों में विभागीय अधिकारियों का पुनर्स्थापन के आवेदन खारिज करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

सेवा को निरंतर मानते हुए लाभ देने का आदेश

कोर्ट ने 1996 की बर्खास्तगी और 2007 व 2012 के आदेशों को रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि मिश्रा को सेवा में निरंतर मानते हुए सभी सेवानिवृत्ति लाभ दिए जाएं। इसके अलावा, 1989 से सेवानिवृत्ति तक का वेतन-भत्ता तीन महीने के भीतर दिया जाए।

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