फिल्म रिव्यू: कोस्टाओ – नवाजुद्दीन सिद्दीकी का बेमिसाल अभिनय, मगर निर्देशन में कमी

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BY: Yoganand Shrivastva

ZEE5 पर स्ट्रीम हो रही फिल्म “कोस्टाओ” में नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक सच्ची कहानी के किरदार को जीवंत करते हैं। वह गोवा के कस्टम अधिकारी कोस्टाओ फर्नांडिस की भूमिका में हैं, जिनकी ईमानदारी और साहस ने 90 के दशक में सोने की तस्करी पर लगाम कस दी थी। फिल्म की कहानी सशक्त है, पर निर्देशन कमजोर कड़ी बनकर सामने आता है।

कहानी की झलक

कोस्टाओ फर्नांडिस की ज़िंदगी एक उदाहरण रही है—देशभक्ति, नैतिकता और बलिदान की मिसाल। फिल्म की शुरुआत एक छोटी बच्ची की आवाज़ से होती है, जो कोस्टाओ को याद करती है। यह बच्ची फिल्म की सूत्रधार भी है और उसी के नजरिए से कहानी को आगे बढ़ाया गया है।

फिल्म दिखाती है कि कैसे एक ईमानदार कस्टम अधिकारी, एक तस्कर माफिया को पकड़ने के दौरान आत्मरक्षा में एक हत्या कर बैठता है। इस घटना के बाद उनकी ज़िंदगी पूरी तरह बदल जाती है। कोर्ट केस, मीडिया ट्रायल, पारिवारिक टूटन और मानसिक तनाव—हर मोर्चे पर उन्हें संघर्ष करना पड़ता है। फिल्म इस कानूनी लड़ाई से ज़्यादा कोस्टाओ की पारिवारिक ज़िंदगी पर केंद्रित रहती है, जिससे मुख्य विषय कुछ हद तक छूट जाता है।

अभिनय की बात करें तो…

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने इस किरदार में पूरी जान डाल दी है। वह कोस्टाओ के इमोशनल, मानसिक और प्रोफेशनल संघर्षों को जिस सहजता से पर्दे पर लाते हैं, वो काबिल-ए-तारीफ है। उनके हाव-भाव, डायलॉग डिलीवरी और स्क्रीन प्रेजेंस इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी है।

प्रिया बापट, जो कोस्टाओ की पत्नी के किरदार में हैं, ने भी बेहतरीन अभिनय किया है। एक पत्नी की चिंता, भय और मजबूरी को उन्होंने संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया है।
हुसैन दलाल, गगन देव रियार और किशोर कुमार जी जैसे सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी कहानी में जान फूंक दी है, भले ही उनके किरदार सीमित हों।
कोस्टाओ की बेटी के किरदार में नजर आने वाली बाल कलाकार ने भी दिल जीत लेने वाला काम किया है।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष

निर्देशन और लेखन दोनों की ज़िम्मेदारी सेजल शाह ने उठाई है। शुरुआत में फिल्म तेज़ गति से और एक इंटेंस माहौल के साथ आगे बढ़ती है, लेकिन आधे समय के बाद फिल्म ट्रैक से भटक जाती है। फिल्म में कोस्टाओ की कानूनी लड़ाई की बारीकियों को नजरअंदाज़ कर, इमोशनल पहलुओं पर अधिक ध्यान दिया गया है। इससे फिल्म का मुख्य उद्देश्य कमजोर पड़ता है।

सिनेमैटोग्राफी शानदार है। गोवा की लोकेशन्स और कैमरा वर्क फिल्म को विजुअल अपील देते हैं। एडिटिंग भी चुस्त है, लेकिन स्क्रिप्ट की कमजोरियां इसे ढंक नहीं पातीं।

फिल्म देखें या नहीं?

अगर आप भावनात्मक और पारिवारिक संघर्षों पर आधारित फिल्में देखना पसंद करते हैं तो “कोस्टाओ” आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकती है। नवाजुद्दीन का अभिनय इस फिल्म को देखने लायक बनाता है।
लेकिन यदि आप कानूनी थ्रिलर या जस्टिस-ओरिएंटेड बायोपिक की उम्मीद कर रहे हैं, तो आपको थोड़ा निराशा हाथ लग सकती है।

फाइनल वर्ड: दमदार अभिनय, सशक्त कहानी, लेकिन कमजोर निर्देशन के चलते यह फिल्म बस एक औसत अनुभव देती है।

रेटिंग: 3/5

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