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एमजे अकबर की प्रधानमंत्री मोदी की टीम में वापसी, 7 साल बाद फिर से महत्वपूर्ण भूमिका में

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BY: Yoganand Shrivstva

नई दिल्ली: वरिष्ठ पत्रकार और राजनेता एमजे अकबर एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की टीम का हिस्सा बन गए हैं। केंद्र सरकार द्वारा आतंकवाद के मुद्दे पर वैश्विक समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से बनाए गए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल में उन्हें शामिल किया गया है। यह प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान के आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उजागर करेगा।

प्रतिनिधिमंडल में मिली जगह

पूर्व केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद के नेतृत्व में यह प्रतिनिधिमंडल यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली और डेनमार्क का दौरा करेगा। एमजे अकबर की गहरी कूटनीतिक समझ और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर पकड़ को देखते हुए उन्हें इस दल में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। वह पहले भी आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान के खिलाफ मुखर रहे हैं और भारतीय सेना के अभियानों की सराहना कर चुके हैं।

2018 का मीटू विवाद और राजनीतिक विराम

साल 2018 में #MeToo आंदोलन के दौरान एमजे अकबर पर कई महिला पत्रकारों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। इस विवाद के बाद उन्हें विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उन्होंने सभी आरोपों को खारिज करते हुए पत्रकार प्रिया रमानी के खिलाफ मानहानि का केस भी दर्ज कराया था। हालांकि, 2021 में दिल्ली की अदालत ने रमानी को आरोपमुक्त कर दिया। अकबर ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। इस प्रकरण ने उनके राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन को काफी प्रभावित किया था, और वे लंबे समय तक सक्रिय राजनीति से दूर रहे।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद कूटनीतिक पहल

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में भारत ने पाकिस्तान और पीओके में आतंकियों के ठिकानों को निशाना बनाकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को अंजाम दिया। अब भारत ने इसी संदर्भ में वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान के खिलाफ जनमत तैयार करने के लिए सात सांसदों का अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भेजा है। इसमें शामिल सांसदों की सूची इस प्रकार है:

  • रवि शंकर प्रसाद (बीजेपी)
  • बैजयंत पांडा (बीजेपी)
  • शशि थरूर (कांग्रेस)
  • संजय कुमार झा (जेडीयू)
  • कनिमोझी करुणानिधि (डीएमके)
  • सुप्रिया सुले (एनसीपी-एसपी)
  • श्रीकांत शिंदे (शिवसेना)

पत्रकारिता से राजनीति तक का सफर

एमजे अकबर का करियर पत्रकारिता से शुरू होकर राजनीति में खास मुकाम तक पहुँचा। 1970 के दशक में उन्होंने ‘संडे’ और ‘एशिया’ जैसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के ज़रिए अपनी पहचान बनाई। बाद में वह ‘द टेलीग्राफ‘ और ‘एशियन एज‘ के संपादक बने। उनकी लिखी किताबें — नेहरू: द मेकिंग ऑफ इंडिया और कश्मीर: बिहाइंड द वेल — ऐतिहासिक और राजनीतिक विश्लेषण के लिए सराही जाती हैं।

राजनीति में उनका आगमन 1989 में कांग्रेस के टिकट पर बिहार के किशनगंज से हुआ, हालांकि 1991 में वह सीट हार गए। 2014 में वह बीजेपी में शामिल हुए और 2015 में राज्यसभा सदस्य बने। 2016 में उन्हें विदेश राज्य मंत्री का पद सौंपा गया, जहां उन्होंने भारत की विदेश नीति को मज़बूती देने में योगदान दिया।

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