BY
Yoganand Shrivastava
Meghalaya भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय में एक ऐसी संस्कृति जीवित है, जो पितृसत्तात्मक समाज की घिसी-पिटी धारणाओं को चुनौती देती है। ‘बादलों के घर’ में बसी खासी जनजाति में सदियों से मातृसत्तात्मक (Matriarchal) परंपरा चली आ रही है। यहाँ घर की धुरी महिलाएं हैं और पुरुषों को शादी के बाद अपना घर छोड़कर पत्नी के घर ‘घर जमाई’ बनकर जाना पड़ता है।
सबसे छोटी बेटी ‘खतदुह’ के हाथ में होती है विरासत की चाबी
Meghalaya खासी समाज में संपत्ति का अधिकार बेटों के पास नहीं, बल्कि बेटियों के पास होता है। परिवार की सबसे छोटी बेटी, जिसे स्थानीय भाषा में ‘खतदुह’ कहा जाता है, वह पूरी पैतृक संपत्ति की मुख्य वारिस होती है। माता-पिता की देखरेख और पूर्वजों की विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। दिलचस्प बात यह है कि यदि किसी परिवार में बेटी नहीं होती, तो वे वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए किसी लड़की को गोद लेते हैं, क्योंकि यहाँ बेटियों के बिना परिवार अधूरा माना जाता है।
पिता नहीं, मां के उपनाम (Surname) से मिलती है पहचान
Meghalaya जहाँ दुनिया के अधिकांश हिस्सों में बच्चों के नाम के पीछे पिता का सरनेम लगता है, वहीं खासी जनजाति में बच्चा मां के नाम से पहचाना जाता है। स्कूल के दाखिले से लेकर सरकारी दस्तावेजों तक, बच्चों के नाम के साथ मां का कुल (Clan) जुड़ा होता है। यहाँ वंश का निर्धारण मां की वंशावली से होता है, न कि पिता की। समाज का यह स्वरूप महिलाओं को न केवल आर्थिक रूप से बल्कि सामाजिक रूप से भी सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है।
कन्यादान की रस्म नहीं, पुरुषों की होती है विदाई
Meghalaya खासी परंपरा में शादी का स्वरूप देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग है। यहाँ ‘कन्यादान’ जैसी कोई रस्म नहीं होती, क्योंकि बेटियों को पराया धन नहीं माना जाता। इसके उलट, विवाह के पश्चात दूल्हा विदा होकर दुल्हन के घर आता है। यहाँ जन्म लेने पर बेटी को बोझ नहीं बल्कि उत्सव का प्रतीक माना जाता है। बाजार से लेकर व्यापार और घर के प्रबंधन तक, सार्वजनिक जीवन के हर क्षेत्र में महिलाओं का वर्चस्व यहाँ की संस्कृति को दुनिया भर में विशिष्ट बनाता है।
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