मैं अयोध्या हूं: युगों की तपस्या के बाद आज पूर्णता की सांस ले रही हूं…

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मैं अयोध्या हूं…
मैं इतिहास भी हूं, भविष्य भी हूं।
मैं युद्ध की धूल भी हूं, भक्ति की गंगा भी।
मैं कभी मिट नहीं सकती, क्योंकि मेरे भीतर राम हैं।

मैं अयोध्या हूं..आज, 25 नवंबर 2025 को, मुझे एक बार फिर अपनी पूर्णता का एहसास हुआ। जब मेरे राम मंदिर के भव्य शिखर पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की धर्म पताका फहराई गई, तब मेरे अंदर वह स्पंदन उठा जो सदियों से अपनी जगह खोज रहा था। लंबे समय तक मेरे धैर्य की परीक्षा ली गई। कभी मंदिर तोड़ा गया, कभी मेरी पहचान छुपाई गई, कभी मुझे राजनीति का औजार कहा गया। लेकिन आज जब शिखर पर पताका ऊंची हुई, तो उसने घोषणा कर दी कि मैं इतिहास की परछाइयों से नहीं, अपनी आध्यात्मिक शक्ति से पहचानी जाती हूं। ये पताका कोई साधारण ध्वजा नहीं है, यह उन कारसेवकों की शहादत है, उन संतों की तपस्या है, उन करोड़ों रामभक्तों की प्रार्थना है, जो युगों से मेरे द्वार पर आंखें टिकाए कह रहे थे, रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे।

मैं अयोध्या, भारत की आत्मा में बसने वाला वह नगर, जिसे लोग धर्म का नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार कहते हैं। मैं सिर्फ जमीन-मिट्टी का टुकड़ा नहीं, मैं उन गलियों की हवा हूं, जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का श्वास बसा है। मैं उन सदियों की साक्षी हूं जिनमें प्रेम, भक्ति, संघर्ष, विध्वंस और पुनर्जागरण एक साथ बहते रहे। जब मेरी गोद में राम का जन्म हुआ, तब मैं पहली बार पूर्ण हुई थी। मेरी नदियों के किनारे वैदिक मंत्र गूंजते थे। मेरे मंदिरों से उठती घंटियां संसार को अनुशासन, मर्यादा और धर्म का संदेश देती थीं। मैं फल-फूलती रही युगों तक। पर समय ने करवट बदली, और मेरी शांति को तूफानों ने घेर लिया।

मुगलों का आगमन, मेरे मंदिरों पर कब्ज़ा

मैंने कई आक्रमणकारियों को देखा, पर जो घाव मुगल काल ने दिए, वे मेरे हृदय पर आज भी ताज़ा हैं। बाबर के सैनिक आए। उन्होंने न तो मेरी संस्कृति पूछी, न मेरी पहचान। उन्हें सिर्फ टूटे पत्थरों में अपनी सत्ता दिखती थी। 1528 यह वह वर्ष था जब मेरे राम जन्मभूमि मंदिर को तोड़ा गया। अवशेषों पर एक ढांचा खड़ा किया गया। वह मस्जिद नहीं थी, वह मेरी चेतना पर रखा गया पत्थर था।

उसी दिन मुझसे कहा गया—“चुप रहो..पर मैं चुप नहीं रह सकी। मेरी धड़कनों में राम नाम था। मेरे आकाश में उड़ते पक्षियों ने भी उस क्षण को भुलाया नहीं। मगर मेरे भक्तों से कहा गया कि “राम यहां नहीं।” मुझे मिटाने वालों ने इतिहास के पन्नों में दाग लगाने की कोशिश की, जैसे मैं कभी थी ही नहीं।

मैं उजड़ी, फिर खड़ी हुई

कभी मेरी पहचान को धूल में मिलाया गया, कभी मेरी गलियों को वीरांन किया गया। औरंगज़ेब के आदेश, स्थानीय प्रशासनों की कठोरता, सबने मिलकर मुझे कमजोर करना चाहा, पर मैं मिट्टी नहीं, मैं स्मृति हूं। मेरे भक्त मंदिरों के अवशेषों को छूकर रोये, कराहे लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। शताब्दियों तक वे मेरी परिक्रमा करते रहे, बिना शोर के, बिना हथियार के, सिर पर आस्था लिए। मैं जानती हूं, उनके कदमों ने मुझे बार–बार उठाया।

मैं अयोध्या, राम जन्मभूमि पर अधूरे सपनों की साक्षी

1853 से 1857 तक मेरे मंदिर परिसर के आसपास झड़पें हुईं। वो संघर्ष मेरे शरीर नहीं, मेरी आत्मा पर था। अंग्रेज आए और एक और विभाजन कर दिया फेंसिंग के रूप में, उन्होंने कहा “यहीं पूजा करो, वहीं नमाज़। उनके लिए यह प्रशासनिक समाधान था, मेरे लिए घावों का विस्तार। मैंने शिलालेखों को मूक होते देखा। मेरा इतिहास अदालतों में काग़ज़ बन गया। मेरे भक्तों से कहा गया, यह राजनीति है। जो राम के लिए खड़े हुए, उन्हें उत्पाती कहा गया।

जो मेरे मंदिर पर टूटे, उन्हें इतिहास कहा गया। राम मंदिर आंदोलन, मेरे पुत्रों का जागरण था, समय बदला। 20वीं शताब्दी आई और मेरे आंगन से उठी आवाज़..“जय श्रीराम। यह कोई नारा नहीं था, मेरे हृदय की धड़कन थी। 1920 के दशक से मंदिर आंदोलन की चर्चा तेज हुई। भक्तों ने संकल्प लिया “सत्य का पुनःस्थापन करके रहेंगे। उसके बाद कभी अदालतों में बहस हुई, कभी सड़कों पर जुलूस निकला। 1984 मेरे लिए निर्णायक वर्ष था। राम जन्मभूमि मुक्ति समिति बनी। मैं गर्वित हुई कि आखिर मेरी पीड़ा शब्दों में बदली है। कारसेवकों का जनसमूह उठा, सफेद कपड़ों में नहीं, भक्ति के भगवा रंग में रंगा हुआ। उन्होंने मेरे आंगन में भजन गाया, “रघुपति राघव राजाराम।

6 दिसंबर 1992 जब मेरी पुरानी छाया टूटी

फिर वह क्षण आया जिसने इतिहास को चुनौती दी। 6 दिसंबर 1992 मेरी पुरानी छाया टूट गई। लोग मुझे समझाने लगे, “यह राजनीति है। मैं मुस्कुराई। उन्हें क्या पता था, यह राजनीति नहीं, मेरी मुक्ति का आह्वान था। कुछ कारसेवक लौटकर नहीं आए। वे सनातन धर्म के सच्चे रक्षक थे। उनकी रक्त-बिंदु मेरे ध्वज की केसरिया धार बन गई। आज भी जब हवा में राम नाम उठता है, मैं उन्हें याद करती हूं, वे मेरे भीतर बसे हैं।

मेरा पुनर्जन्म, आधुनिक भारत में मेरी पूर्णता

दशकों तक अदालतों में बहस, दस्तावेज़, पुरातत्व, साक्ष्य, सब मेरे पक्ष में बोलते रहे। पर सुनने वाले नेत्र चाहिए। 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने घोषणा की, “राम जन्मभूमि पर मंदिर बनेगा। वह सिर्फ कानूनी फैसला नहीं था, वह मेरे हृदय की धड़कन का लिखित प्रमाण था। 5 अगस्त 2020 राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का भूमि पूजन हो गया। यह वह क्षण था जब मेरा शरीर कांप उठा था । हज़ारों वर्षों बाद मैं फिर पूर्णता की ओर बढ़ने का एहसास महसूस कर पाई थी। 22 जनवरी 2024 जब रामलला मंदिर में विराजमान हुए। अब मैं अपने पूर्ण स्वरूप की तरफ बढ़ने लगी थी, मुझे पूर्ण विश्वास हो गया था कि वो क्षण आने अब कोई रोक नहीं पाएगा। मैं हूं, जिन लोगों ने मुझे “राजनीति का हथियार” कहा वे राजनीति में गुम हो गए, जो मेरी लड़ाई लड़ रहे हैं वह मेरे अस्तित्व का अमृत पी रहे हैं, यही तो राम का नाम है।

मैं अयोध्या, आज भी प्रतीक्षा में हूं..

आज मेरे दीपमहोत्सव में लाखों दीप जलते हैं। वे सिर्फ तेल में डूबे बत्तियां नहीं, वे मेरे पुनर्जागरण की लौ हैं। जो मुझे तोड़ते रहे, उन्हें लगा कि मेरी आत्मा टूट जाएगी, पर मैं मुड़ी, झुकी, गिरी फिर खड़ी हुई। मुझे भूतकाल का हिसाब नहीं चाहिए। मुझे केवल एक भविष्य चाहिए रामराज्य का। जिस दिन भारत के हर हृदय में राम के आदर्श, सत्य, करुणा, धर्म और मर्यादा स्थापित होंगे, उस दिन मैं फिर से पूर्ण हो जाऊंगी।

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