अमेरिका में लोकतंत्र खतरे में? भारत को रिश्तों में संतुलन की सलाह !

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"If we had an Indian Supreme Court..." : Jeffrey Sachs' blunt words on America

जेफ्री सैक्स का भारत को संदेश: अमेरिका के खेल से दूर रहो

BY: Vijay Nandan

नई दिल्ली: कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जेफ्री डी. सैक्स ने अमेरिका की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका में भारत जैसी स्वतंत्र और सक्रिय सुप्रीम कोर्ट होती, तो उन्हें सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर कोई डर नहीं होता।

राइजिंग भारत समिट 2025 में बोलते हुए सैक्स ने अमेरिका की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गहरी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, “भारतीय सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्था होती तो हम राष्ट्रपति की मनमानी को रोक सकते। लेकिन अमेरिका में यह स्पष्ट नहीं है कि हमारे न्यायालय ऐसे निर्णयों पर लगाम लगा सकते हैं या नहीं।”

ट्रंप की नीतियों पर तीखा हमला

जेफ्री सैक्स ने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल की नीतियों को लोकतंत्र के लिए खतरनाक करार दिया। उन्होंने बताया कि किस तरह ट्रंप ने व्यापार घाटे को ‘आपातकाल’ घोषित कर, कानून को बायपास कर शासन चलाने की कोशिश की।
“वे कोई भी समस्या को आपातकाल घोषित कर देते हैं, फिर चाहे वह दशकों पुराना व्यापार घाटा ही क्यों न हो,” सैक्स ने कहा। उन्होंने चेताया कि इस प्रवृत्ति ने अमेरिका को ‘गंभीर रूप से अस्थिर’ कर दिया है।

“अमेरिका में एक व्यक्ति की तानाशाही की ओर झुकाव”

उन्होंने कहा कि अमेरिका में सत्ता एक व्यक्ति के पास केंद्रित होती जा रही है, और यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। “क्या हमारी अदालतें वास्तव में यह कहने की हिम्मत रखेंगी कि राष्ट्रपति का कदम गैरकानूनी है? और क्या हमारा संसद अपने अधिकारों को वापस ले पाएगा?” उन्होंने सवाल उठाया।

भारत को अमेरिका से दोस्ती में सावधानी बरतने की सलाह

जेफ्री सैक्स ने भारत को अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास दिखाता है कि वह केवल अपने फायदे के लिए गठबंधन करता है।

“अमेरिका चाहता है कि भारत चीन के खिलाफ खड़ा हो, लेकिन भारत को किसी का मोहरा बनने से बचना चाहिए,” उन्होंने चेताया।

सैक्स ने स्पष्ट किया कि भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखनी चाहिए और किसी भी गुटबंदी में शामिल होने से पहले राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

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