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हैदराबाद रियल एस्टेट संकट: 200 मीटर बफर जोन के नए नियमों से भूखंड मालिकों में हड़कंप

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200 मीटर बफर जोन

हैदराबाद रियल एस्टेट में उथल-पुथल: नए एलआरएस नियमों के तहत 200 मीटर बफर जोन से मचा हड़कंप

हैदराबाद का रियल एस्टेट बाजार नए संकट में फंस गया है। भूमि नियमितीकरण योजना (एलआरएस) के तहत जल निकायों के पास 200 मीटर के बफर जोन लागू होने से भूखंड मालिकों में दहशत फैल गई है। सख्त जांच और एनओसी में देरी ने इस क्षेत्र को और प्रभावित किया है।

हैदराबाद के शहरी जल निकायों का हवाई दृश्य, जो नए बफर जोन नियमों से प्रभावित आवासीय क्षेत्रों से घिरा हुआ है।


नए एलआरएस नियम और 200 मीटर बफर जोन क्या हैं?

  • बफर जोन का विस्तार: अब झीलों, नदियों और जल निकायों के आसपास प्रतिबंधित क्षेत्र 30-50 मीटर से बढ़कर 200 मीटर (656 फीट) हो गया है।
  • नई एनओसी अनिवार्य: भूखंड मालिकों को राजस्व और सिंचाई विभागों से नई अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेना होगा; पुराने प्रमाणपत्र अब मान्य नहीं हैं।
  • 25% छूट के साथ शर्तें: एलआरएस शुल्क अग्रिम भुगतान करने पर खुले स्थान शुल्क में छूट मिलेगी, लेकिन जांच अब सख्त हो गई है।
200 मीटर बफर जोन

भूखंड मालिकों में दहशत क्यों?

नए नियमों ने भूस्वामियों को परेशानी में डाल दिया है। पहले राज्य विभागों से जारी एनओसी लेनदेन के लिए पर्याप्त थे, लेकिन हाल ही में एचएमडीए द्वारा कटवा चेरुवु और अन्य जल निकायों के पास अवैध निर्माण ढहाए जाने के बाद नियम सख्त कर दिए गए।

  • बाजार मूल्य में गिरावट: जल निकायों से 200 मीटर के दायरे में आने वाली संपत्तियाँ अब “विवादित” मानी जा रही हैं, जिससे खरीदार दूर हो रहे हैं और कीमतें गिर रही हैं।
  • एनओसी में देरी: राजस्व और सिंचाई विभागों में कर्मचारियों की कमी के कारण मंजूरी में देरी हो सकती है, जिससे बिक्री और विकास प्रभावित हो रहा है।
  • संदिग्ध मकसद: कुछ आलोचकों का मानना है कि राज्य के खजाने में कमी के कारण सरकार ने यह नीति अचानक लागू की है।

जीओ 168 बनाम नए नियम: एक बड़ा अंतर

पहले के नियम (जीओ 168, 2012) के तहत बफर जोन इस प्रकार थे:

  • 10 हेक्टेयर से छोटी झीलों/तालाबों के लिए 9 मीटर।
  • बड़े जल निकायों के लिए 30 मीटर।
  • शहरी नदियों के लिए 50 मीटर।

अब 200 मीटर का नया नियम—जो 566% की वृद्धि है—पुराने मानकों को तोड़ रहा है और निवेशकों में असमंजस पैदा कर रहा है।


रियल एस्टेट पर असर

हैदराबाद का संपत्ति बाजार, जो पहले से ही मंदी से जूझ रहा है, अब और गहरे संकट में है:

  • लेनदेन ठप: जल निकायों के पास भूखंडों की कानूनी अनिश्चितता के कारण खरीदार पीछे हट रहे हैं।
  • दलालों की मुश्किलें: छोटे भूखंडों के कमीशन पर निर्भर ब्रोकरों की आय घट रही है।
  • निर्माण रुका: डेवलपर्स ने स्पष्टता के इंतजार में परियोजनाएँ रोक दी हैं, जिससे रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है।

भूखंड मालिकों के लिए आगे क्या?

अधिकारी आश्वासन दे रहे हैं कि एफटीएल और बफर जोन से बाहर के भूखंडों को जांच के बाद नियमित किया जाएगा, लेकिन हितधारक पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि नीति में संशोधन न होने पर:

  • झील किनारे की संपत्तियों का मूल्य लंबे समय तक कम हो सकता है।
  • विवादित जमीनों को लेकर कानूनी लड़ाई बढ़ सकती है।
  • निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है।

तेलंगाना सरकार के नए एलआरएस दिशानिर्देशों ने हैदराबाद के रियल एस्टेट को अनिश्चितता में डाल दिया है। 200 मीटर के बफर जोन और एनओसी की बढ़ती मुश्किलों के साथ, भूखंड मालिक और एजेंट कठिन समय के लिए तैयार हैं। कांग्रेस सरकार राजस्व बढ़ाने की कोशिश में जुटी है, लेकिन इन उपायों की मानवीय और आर्थिक कीमत पर सवाल उठ रहे हैं। अब इस क्षेत्र की रिकवरी नीतिगत स्पष्टता और हितधारकों के बीच संवाद पर निर्भर करती है।

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