by: vijay nandan
Galgotias University controversy : ग्रेटर नोएडा, हाल ही में आयोजित India AI Impact Summit 2026 के दौरान एक रोबोट डॉग को लेकर हुए विवाद के बाद गलगोटियास यूनिवर्सिटी सुर्खियों में आ गई है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद यूनिवर्सिटी के दावों पर सवाल उठे, जिससे संस्थान चर्चा के केंद्र में आ गया।
समिट में यूनिवर्सिटी के स्टॉल पर ‘ओरियन’ नाम का एक रोबोट डॉग प्रदर्शित किया गया था। दावा किया गया कि इसे संस्थान के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ने विकसित किया है। हालांकि बाद में सामने आया कि यह रोबोट चीन की कंपनी Unitree Robotics का मॉडल Unitree Go2 है, जो बाजार में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध है। विवाद बढ़ने के बाद आयोजकों ने यूनिवर्सिटी को स्टॉल हटाने के निर्देश दिए। यूनिवर्सिटी की तरफ से बाद में सफाई दी गई, कि उन्होंने शायद एक्सप्लेन करने में गलती कर दी या लोगों के समझने में लगती हो रही है।

Galgotias University controversy : कौन हैं मालिक?
गलगोटियास यूनिवर्सिटी के संस्थापक और चांसलर सुनील गलगोटिया हैं, जबकि उनके बेटे ध्रुव गलगोटिया संस्थान के सीईओ हैं। परिवार का व्यवसायिक सफर किताबों के कारोबार से शुरू हुआ था।
Galgotias University controversy : छोटी दुकान से शिक्षा साम्राज्य तक
गलगोटिया परिवार की शुरुआत दिल्ली के कनॉट प्लेस में एक छोटी किताबों की दुकान से हुई। बाद में 1980 के दशक में सुनील गलगोटिया ने पब्लिशिंग का काम शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय परीक्षाओं से जुड़ी पुस्तकों के वितरण अधिकार मिलने के बाद उनका कारोबार तेजी से बढ़ा।
साल 2000 में मात्र 40 छात्रों के साथ एक मैनेजमेंट और टेक्नोलॉजी संस्थान की स्थापना की गई। इसके बाद इंजीनियरिंग कॉलेज और अन्य संस्थान शुरू हुए। वर्ष 2011 में उत्तर प्रदेश सरकार से विश्वविद्यालय का दर्जा मिलने के बाद गलगोटियास यूनिवर्सिटी अस्तित्व में आई।
आज इस संस्थान में 40,000 से अधिक छात्र अध्ययन कर रहे हैं। विभिन्न देशों से छात्र यहां आते हैं और बड़ी संख्या में पूर्व छात्र दुनिया भर में कार्यरत हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, समूह का कुल मूल्य लगभग 3000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।

Galgotias University controversy : विवाद क्यों बढ़ा?
एआई समिट में रोबोट को अपने इनोवेशन के रूप में पेश किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर आलोचना शुरू हो गई। यूनिवर्सिटी ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि रोबोट को छात्रों के प्रशिक्षण और सीखने के उद्देश्य से खरीदा गया था, लेकिन शुरुआती प्रस्तुति में स्पष्टता की कमी के कारण विवाद बढ़ गया। यह घटना संस्थान की साख और पारदर्शिता को लेकर बहस का विषय बन गई है।
संपादकीय नजरिया
अब यूनिवर्सिटी की तरफ से कुछ भी दावे कर लिए जाएं कितनी ही सफाई दी जाए, लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में बात निकली नहीं की दुनियाभर में फैल गई और वैसे भी झूठ के तो पैर लगे होते हैं। इस झूठे दावे से दूनिया भर में भारत के तकनीकी क्षमता की बदनामी तो हो गई। अब होना चाहिए कि एआई इम्पैक्ट जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में प्रतिभागियों और संस्थानों के चयन की प्रक्रिया बेहद सख्त और पारदर्शी होनी चाहिए। यदि किसी विश्वविद्यालय ने बाहरी तकनीक को अपना नवाचार बताकर प्रस्तुत किया, तो यह केवल संस्थान की साख पर ही नहीं, बल्कि आयोजन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करता है। ऐसे मंच भारत की तकनीकी क्षमता और नवाचार संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की भ्रामक प्रस्तुति देश की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।
यह घटना आयोजकों की जांच-परख प्रक्रिया में कमी की ओर भी संकेत करती है। भविष्य में ऐसे मामलों से बचने के लिए तकनीकी सत्यापन और दावों की स्वतंत्र जांच अनिवार्य की जानी चाहिए। वहीं, सरकार और नियामक संस्थाओं को भी तथ्य सामने आने पर जवाबदेही तय करनी चाहिए। यदि गलती जानबूझकर की गई है, तो आवश्यक कार्रवाई के साथ-साथ शैक्षणिक संस्थानों के लिए आचार-संहिता को और कड़ा करना समय की मांग है।





