दशकों बाद भी आदिम काल में जीने को मजबूर ग्रामीण

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रिपोर्टरः जावेद खान-अपडेटः योगानंद श्रीवास्तव

लगातार स्वदेश न्यूज की टीम हर उस अंदरूनी इलाके पर पहुंचने की कोशिश कर रही है जहां से जनसरोकार के मुद्दों को उठाया जा सके..इसी खबर की तलाश में और जन मुद्दों और जनसरोकार की बात की तलाश में आज स्वदेश न्यूज की टीम ऐसे गांव में पहुंची जहां की तस्वीरें आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि आज भी ऐसे इलाके मौजूद है जहां लोग आज भी आधुनिकता से दूर सीमित संसाधनों में सिस्टम की उदासीनता का दंश झेल रहे हैं… एक तस्वीर ऐसी भी जहां आज भी ग्रामीण अपने चूल्हे जलने आग के लिए एक दूसरे के घरों पर निर्भर हैं

मूलभूत सुविधा नदारद, आदिवासियों जैसा जीवन जीने को मजबूर ग्रामीण

दरअसल हम बात कर रहे हैं कांकेर जिले के अंतागढ़ ब्लॉक के एडानार पंचायत के आश्रित गांव मसपुर की जान आज भी लोग आदिम काल में जीने को मजबूर है ..दरअसल आज स्वदेश की टीम उस जगह पर पहुंची जहां दृश्य हैरान करने वाले ..यकीन मानिए इस गांव में अगर उस पथरीले रास्ते को वरदान कहें तो गलत नहीं होगा क्योंकि ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की जरूरत की बात हो या बात हो उस गांव से कही दूसरे जगह जाने की तो 4 किलो मीटर का सीधी चढ़ाई वाला पहाड़ी पगडंडी ही उनका एक मात्र सहारा है …जैसे जैसे हमारी टीम आगे बढ़ती गई चढ़ाई के साथ साथ चुनौतियां भी उस जगह पर बढ़ती गई ..पहाड़ी दुर्गम जंगलों से घिरा इलाका न पानी न बिजली और न ही कोई सुविधा ..पर अगली तस्वीर जानने की जिज्ञासा के साथ उस पहाड़ी की घंटों चढ़ाई करने के बाद जब टीम गांव में पहुंची तो तस्वीर उस जगह की हैरान करने वाली

न बिजली न पानी आखिर कैसे गुजर बसर करें ग्रामीण?

गांव में पहुंचने और लोगो से बातचीत के बाद पता चला कि उस जगह की अपनी ही एक अलग दास्तान है …ग्रामीणों ने बताया कि कुछ समय पहले विद्युत कनेक्शन के लिए पहाड़ी पर लोहे के पोल लगाए गए जिसमें ग्रामीणों ने बिना किसी तरीके का मेहनताना लिए पोल लगाने का काम किया आधी दूरी तक पोल लगे भी फिर कुछ दिनों बाद विद्युत व्यवस्था ठंडे बस्ते में …वही ग्रामीणों ने यह भी बताया कि उस गांव में निवासरत ग्रामीणों ने जब पानी की समस्या के चलते संबंधित विभाग से मिन्नतें की तो विभाग ने सड़क ना होने के चलते उस जगह पर बोरवेल खनन की गाड़ी न पहुंचने का हवाला दिया …तो ग्रामीणों ने एकजुटता दिखा कर बोलवेल खनन की गाड़ी आ सकने लायक सड़क बनाने जुट गए जिसमें ग्रामीणों ने बताया पूरे 17हजार रुपए ग्रामीणों के खर्च हुए पर लाभ उन्हें शून्य ही मिला …वही जैसे जैसे दिन ढल रहा था उस गांव में समस्याओं का सिलसिला जारी था ..

स्वास्थ्य सेवा भी नदारद, ग्रामीणों को करना पड़ रहा परेशानियों का सामना

ग्रामीणों ने हमे गांव में हर उस जगह और हर उस समस्या से रूबरू करवाया जो आप तस्वीरों में देखेंगे ..पूरे गांव में लगभग 200 लोगों से ज्यादा लोग निवास करते है ..आज भी उनकी जीवन शैली में लगभग वो प्राकृतिक चीजों पर ही निर्भर है ..गांव में स्थित एकमात्र जलश्रोत जो 12 महीने सूखता नहीं लोग वहां से इस्तेमाल के लिए पानी ले जाते है ..तस्वीरें आपको हैरान कर सकती है क्योंकि पानी में हमने वो गंदगी पाई जो उस पानी के इस्तेमाल कर रहे लोगों के बीमारी का कारण बन सकती है …वहीं गांव में हमने स्वास्थ्य व्यवस्था के भी हाल को समझना चाहा पर तस्वीरों में हमने पाया कि 8महीने की गर्भवती महिला जो कि काफी ऊंची चढ़ाई अपने सर पर पानी के बर्तन रख उसी झरिया से पानी लाते दिखाई दीं जहां से पूरा गांव पानी पिता है उस पथरीले रास्ते में अगर जरा भी पैर फिसले तो अनहोनी से इनकार नहीं किया जा सकता…अब आप समझ सकते है कि जिस जगह की पानी मवेशी और इंसान एक जगह से पी रहे हो तो उस महिला के आने वाले बच्चे का स्वास्थ्य कैसा होगा …वहीं महिला ने बातचीत के दौरान बताया कि आंगनबाड़ी ही इस जगह पर नहीं है तो वहां से मिलने वाले लाभ या स्वास्थ्य विभाग द्वारा मिलने वाला किसी भी प्रकार का लाभ उस जगह पर नहीं मिलता

शिक्षा व्यवस्था बेहाल, बच्चों का भविष्य अंधकार में

गांव की तमाम तस्वीरों को देखने के बाद हमे ग्रामीणों ने यह बताया कि पहली बार स्वदेश न्यूज एक ऐसा न्यूज प्लेटफॉम है जो उन तक पहुंच कर उनकी बातों को शासन प्रशासन तक पहुंचाएगा ऐसा उन्हें उम्मीद है ..वहीं अगर बात इस जगह के शिक्षा व्यवस्था की की जाए तो गांव में एक प्राथमिक शाला है जहां 5 वीं तक तो पढ़ाई मुहैया हो जाती है पर दुर्गम पहाड़ी रस्ते आगे की पढ़ाई में बाधा बनते है ..सुनने में अजीब लग सकता है निश्चित ही इस गांव कोई 5 से ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं है ..वहीं ग्रामीणों ने बताया कि किसी आपात स्थिति में चाहे गर्भवती महिलाओं को या किसी अन्य बीमार व्यक्ति को अस्पताल ले जाना इनके लिए बहुत बड़ी चुनौती बनता है क्योंकि 4किलो मीटर की पहाड़ी चढ़ाई के अलावा कोई रास्ता इस गांव में नहीं है ..और आज तक उन्हें खाट में मरीज को उठा कर पहाड़ से उतारने को विवश होना पड़ता है …वहीं हमने जानना चाहा कि ग्रामीण राशन कहां से और कैसे लाते है तो जवाब सुन हमें भी हैरानी हुई कि राशन दुकान से मिलने वाला 50 से 60 किलो राशन वो अपने सर में रखकर पहाड़ी के नीचे पंचायत एडानार से लेकर इन्हीं खड़ी चढ़ाई को चढ़कर लाते है कल्पना कीजिए कितना भयावह होता होगा बारिश में इनका ऐसे बीहड़ों का संघर्ष वही पूरे गांव में एक भी पक्का मकान नहीं देखने को मिला कच्ची खपरैल घरें कई घरों की तस्वीर तो ऐसी मानो हल्की बारिश में वह ढह जाए पर ग्रामीणों ने टीम को हर वो समस्या गांव की दिखाई जो उस जगह के रहवासियों के जीवन के संघर्ष को प्रत्यक्ष दिखा रहा था वही ग्रामीणों ने रात तकरीबन 9 बजे एकजुटता के साथ टीम को पहाड़ी के बीच तक रास्ता दिखाते पहुंचे साथ में नवनिर्वाचित जिला पंचायत सदस्य गुप्तेश उसेंडी भी हमारे साथ मौजूद रहे …तमाम तस्वीरों में है आपको यह दिखने की कोशिश कर रहे है कि आखिर जिम्मेदार कब ऐसे इलाकों की सुध लेने पहुंचेंगे।

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