संविधान से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने की उठी मांग, RSS के दत्तात्रेय होसबोले ने उठाया सवाल

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BY: Yoganand Shrivastva

नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता और महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में मौजूद ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को लेकर नया विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने इन दोनों शब्दों को हटाने या उनकी समीक्षा की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि ये मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे, बल्कि आपातकाल (1975-77) के दौरान जोड़ दिए गए थे।


क्या संविधान में बदलाव की तैयारी है?

दत्तात्रेय होसबोले ने दावा किया कि डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा बनाए गए मूल संविधान में इन शब्दों का कोई उल्लेख नहीं था। उन्होंने कहा,

“आपातकाल के दौरान जब देश में मौलिक अधिकार निलंबित थे, संसद निष्क्रिय थी और न्यायपालिका पर दबाव था — तब इन शब्दों को प्रस्तावना में जोड़ा गया। सवाल यह है कि क्या उस परिस्थिति में जोड़े गए शब्द भारत के स्थायी मूल्य हैं?”


आरएसएस महासचिव की टिप्पणी का संदर्भ क्या है?

होसबोले आपातकाल की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने जोर देकर कहा कि समय आ गया है कि यह विचार किया जाए कि क्या ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसी विचारधाराएं आज के भारत के लिए प्रासंगिक हैं और क्या उन्हें संविधान की प्रस्तावना में स्थान मिलना चाहिए।

उन्होंने आगे कहा:

“प्रस्तावना कोई साधारण पंक्तियां नहीं होती, यह भारत की आत्मा का प्रतिबिंब है। क्या समाजवाद एक शाश्वत भारतीय मूल्य है या केवल एक राजनीतिक विचारधारा है?”


इतिहास क्या कहता है?

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़े गए थे। इस संशोधन को इंदिरा गांधी सरकार ने लागू किया था, जो उस समय आपातकाल के कठोर दौर से गुजर रही थी।

मूल प्रस्तावना केवल “We, the people of India…” से शुरू होती थी और उसमें भारत को एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बताया गया था।


सियासी और वैचारिक बहस फिर तेज

होसबोले के इस बयान के बाद एक बार फिर इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो सकती है।
जहां संघ समर्थक इस विचार को “संविधान की मूल भावना की वापसी” बता सकते हैं, वहीं विपक्षी और उदार विचारधारा के लोग इसे धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र पर हमला मान सकते हैं।


क्या अब वाकई प्रस्तावना बदलेगी?

हालांकि यह केवल चर्चा का सुझाव है, लेकिन आरएसएस जैसे संगठनों के नेताओं के बयान अक्सर राजनीतिक विमर्श को प्रभावित करते हैं। यदि सरकार इस विषय को गंभीरता से लेती है, तो यह संविधान संशोधन की दिशा में पहला कदम साबित हो सकता है।

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