Report: Rakesh Chandwanshi
Chhindwara मध्य प्रदेश की प्राकृतिक छटा और आध्यात्मिकता का संगम कहे जाने वाले सतपुड़ा की पहाड़ियों में एक बार फिर आस्था का सैलाब उमड़ने वाला है। चौरागढ़ महादेव के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक महादेव मेला 6 फरवरी से शुरू होने जा रहा है। छिंदवाड़ा और नर्मदापुरम (पूर्व नाम होशंगाबाद) की सीमा पर आयोजित होने वाला यह मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं के अटूट विश्वास का प्रतीक है।
आस्था की कठिन डगर और त्रिशूलों की परंपरा
Chhindwara चौरागढ़ महादेव का मंदिर समुद्र तल से लगभग 1,300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ की चढ़ाई जितनी चुनौतीपूर्ण है, भक्तों का उत्साह उतना ही प्रबल होता है। इस मेले की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर भारी-भरकम लोहे के त्रिशूल अपने कंधों पर उठाकर दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हैं और मंदिर शिखर पर अर्पित करते हैं। “बम-बम भोले” के जयकारों के बीच हज़ारों त्रिशूलों का मंदिर प्रांगण में जमा होना एक विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है।

दो जिलों का सांस्कृतिक और प्रशासनिक संगम
Chhindwara यह मेला भौगोलिक रूप से छिंदवाड़ा और नर्मदापुरम जिलों की सीमाओं को जोड़ता है। पचमढ़ी की सुरम्य वादियों में लगने वाले इस मेले में मध्य प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों से लाखों की संख्या में लोग पहुँचते हैं। इतनी विशाल भीड़ और कठिन रास्तों को देखते हुए प्रशासन ने कमर कस ली है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा, शुद्ध पेयजल की आपूर्ति, जगह-जगह स्वास्थ्य शिविर और विश्राम स्थलों का पुख्ता इंतजाम किया गया है ताकि भक्तों की यात्रा सुगम हो सके।
पचमढ़ी का बदला स्वरूप और आध्यात्मिक पर्यटन
Chhindwara मेले के दौरान पूरा पचमढ़ी क्षेत्र शिवमय हो जाता है। प्रकृति की गोद में स्थित महादेव का यह दरबार आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र बन जाता है। यहाँ आने वाले लोग न केवल महादेव के दर्शन करते हैं, बल्कि सतपुड़ा की सुंदरता का आनंद भी लेते हैं। स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी यह समय बेहद महत्वपूर्ण होता है, जहाँ छोटे व्यापारियों और पर्यटन क्षेत्र को एक नई संजीवनी मिलती है।





