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Bokaro: बेटे की शहादत और न्याय की आस, ADM बिल्डिंग के द्वार पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठी प्रेम महतो की मां

Bokaro

Report: Sanjeev kumar

Bokaro न्याय की लड़ाई जब अपनों के खोने के दर्द से जुड़ती है, तो वह और भी अडिग हो जाती है। बोकारो स्टील प्लांट (BSL) के प्रशासनिक भवन (ADM Building) के मुख्य द्वार पर आज एक भावुक और आक्रोशित कर देने वाला नजारा देखने को मिला। 3 अप्रैल 2025 को नियोजन की मांग के दौरान हुए लाठीचार्ज में जान गंवाने वाले प्रेम महतो की मां, गोमती देवी, अब अपने बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गई हैं। उनके साथ बड़ी संख्या में विस्थापित भी अपनी मांगों को लेकर हुंकार भर रहे हैं।

प्रबंधन के वादे पड़े खोखले, एक साल से इंसाफ का इंतजार

Bokaro मृतक प्रेम महतो की मां गोमती देवी का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने बताया कि बेटे की मौत के बाद प्रबंधन ने कई बड़े वादे किए थे। इनमें सेक्टर 4 से नयामोड़ के बीच प्रेम की प्रतिमा स्थापित करने के लिए 20 डिसमिल जमीन, परिजनों को नियोजन (नौकरी) और 1500 अप्रेंटिस की बहाली शामिल थी। गोमती देवी ने कहा, “मेरा बेटा तो चला गया, लेकिन उसकी शहादत को सम्मान देने के बजाय प्रबंधन एक साल से चुप्पी साधे बैठा है। अब जब तक मांगें पूरी नहीं होंगी, मैं यहाँ से नहीं उठूँगी।”

“शहादत दिवस” से पहले प्रतिमा अनावरण की मांग

Bokaro आंदोलन का नेतृत्व कर रहे विस्थापित नेता अजय महतो ने प्रबंधन और प्रशासन पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि न्याय के लिए वे सांसद, विधायक, डीसी और बोकारो स्टील के प्रतिनिधियों के चक्कर काट-काट कर थक चुके हैं। उनकी मुख्य मांग है कि 3 अप्रैल को आने वाले ‘शहादत दिवस’ से पहले 20 डिसमिल जमीन आवंटित की जाए ताकि समय पर प्रतिमा का अनावरण किया जा सके। उन्होंने चेतावनी दी कि विस्थापितों ने अपनी जमीनें इसलिए नहीं दी थीं कि उन्हें सड़कों पर लाठियां खानी पड़ें और जान गंवानी पड़े।

विस्थापितों का एकजुट समर्थन: “हम सब प्रेम की मां हैं”

Bokaro इस आंदोलन ने अब एक जन-आंदोलन का रूप ले लिया है। धरने पर बैठी गोमती देवी को समर्थन देने पहुंचे विस्थापितों ने नारा दिया कि आज इस लड़ाई में हर कोई “प्रेम की मां” बनकर खड़ा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रबंधन विस्थापितों के धैर्य की परीक्षा ले रहा है, जो अब जवाब दे रहा है। ADM बिल्डिंग के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती के बीच विस्थापित अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं, जिससे बोकारो स्टील प्रबंधन पर दबाव बढ़ता जा रहा है।

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