पाक के खिलाफ भारत की नई चाल: अफगानिस्तान के साथ रणनीतिक गठजोड़
BY: VIJAY NANDAN
India-Afghanistan Relations: अफगानिस्तान में तालिबान की दोबारा सत्ता वापसी (2021) के बाद पहली बार भारत ने उससे उच्च-स्तरीय राजनयिक संवाद स्थापित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न केवल अफगानिस्तान के साथ भारत की सक्रियता को दर्शाता है, बल्कि पाकिस्तान की चिंता भी बढ़ाने वाला है। चलिए जानते हैं कि भारत ने यह रणनीति क्यों अपनाई और इससे क्षेत्रीय समीकरणों पर क्या असर होगा – 5 अहम बिंदुओं में:

1. जयशंकर-मुत्ताकी वार्ता: चार साल बाद तालिबान से पहला आधिकारिक संवाद
15 मई की शाम भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के बीच टेलीफोन पर अहम बातचीत हुई। इस वार्ता में दोनों देशों ने ऐतिहासिक संबंधों को फिर से मजबूत करने पर सहमति जताई। भारत ने अफगानिस्तान में अधूरी पड़ी विकास परियोजनाओं को फिर शुरू करने का आश्वासन दिया है। वहीं तालिबान ने भारत से व्यापार, चिकित्सा वीजा और अफगान कैदियों की वापसी को लेकर सहयोग की मांग की है।
2. पाकिस्तान को रणनीतिक झटका: भारत की चाल में छिपी चेतावनी
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव बना हुआ है, खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को लेकर। भारत की यह पहल पाकिस्तान के लिए नई चुनौती बन सकती है। भारत यदि तालिबान से सामरिक सहयोग बढ़ाता है तो पाकिस्तान की सीमाओं के आसपास की स्थिति और ज्यादा अस्थिर हो सकती है। यह ठीक वैसा ही कदम है जैसा पाकिस्तान ने बांग्लादेश में भारत विरोधी रणनीति के तहत उठाया था।
3. व्यापार और लॉजिस्टिक्स को मिलेगा नया रास्ता
अफगानिस्तान भारत को हींग, केसर, ड्राई फ्रूट्स जैसे कई महंगे कृषि उत्पादों का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। वहीं भारत से अफगानिस्तान को दवाइयां, कपड़े और मसाले भेजे जाते हैं। वर्तमान में ये व्यापार पाकिस्तान के रास्ते होते हैं, जो अक्सर सीमा बंदी के चलते बाधित हो जाते हैं। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत और अफगानिस्तान सीधे व्यापार कर सकते हैं, जिससे न सिर्फ लागत घटेगी बल्कि पाकिस्तान की भूमिका भी खत्म हो जाएगी।
4. पानी पर नया संकट: शहतूत और कुनार परियोजना से पाकिस्तान को खतरा
भारत की मदद से अफगानिस्तान ‘शहतूत बांध’ परियोजना को दोबारा शुरू कर रहा है, जो काबुल नदी पर बनेगा। यह नदी पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा इलाके के लिए अहम है। अगर अफगानिस्तान इस पानी को रोकता है, तो पाकिस्तान के इन क्षेत्रों में जल संकट गहरा सकता है। इसी तरह तालिबान ने कुनार नदी पर भी बांध बनाने की घोषणा की है, जिससे पाकिस्तान को बिजली और पानी दोनों में संकट का सामना करना पड़ेगा।
5. भारत-अफगान सहयोग से पाकिस्तान की सीमाएं और अस्थिर होंगी
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच 9 नदियों का साझा बेसिन है, लेकिन दोनों के बीच कोई जल समझौता नहीं है। ऐसे में यदि अफगानिस्तान भारत के सहयोग से सभी प्रमुख नदियों पर परियोजनाएं शुरू करता है, तो पाकिस्तान इसे रोकने की न तो कानूनी हैसियत रखता है और न ही तालिबान पर दबाव बना सकता है। यह स्थिति पाकिस्तान के अशांत प्रांतों में असंतोष और विद्रोह को और भड़का सकती है, जिससे भारत की रणनीतिक स्थिति मजबूत होगी।
भारत और तालिबान की बढ़ती बातचीत ने पाकिस्तान की चिंता बढ़ा दी है। यह कूटनीतिक पहल न केवल व्यापार और सुरक्षा के लिहाज से अहम है, बल्कि दक्षिण एशिया की जियोपॉलिटिक्स में एक नए संतुलन की ओर भी संकेत करती है। भारत अब दर्शक की भूमिका से निकलकर सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है, और पाकिस्तान के लिए यह एक स्पष्ट चेतावनी भी है।





