Balaghat : मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत रंगारी के लिए नियति ने एक ऐसी पटकथा लिखी, जिसने सात सालों तक उनके परिवार को गहरे अंधेरे में रखा। मानसिक अस्वस्थता के कारण भटकते हुए सीमा पार कर पाकिस्तान पहुँचे प्रसन्नजीत आखिरकार शुक्रवार शाम सुरक्षित अपने घर लौट आए हैं। उनकी वापसी ने न केवल एक परिवार की वर्षों पुरानी उम्मीदों को जिंदा किया है, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता की भी एक मिसाल पेश की है।
होनहार छात्र से पाकिस्तान की कालकोठरी तक का सफर
Balaghat प्रसन्नजीत कभी एक होनहार छात्र थे, जिन्होंने जबलपुर से बी-फार्मेसी की डिग्री हासिल की थी। पिता ने कर्ज लेकर बेटे का भविष्य संवारा था, लेकिन मानसिक संतुलन बिगड़ने के कारण प्रसन्नजीत की जिंदगी की राह बदल गई। साल 2017-18 में वह अचानक लापता हो गए। परिजनों ने उन्हें मृत मान लिया था, लेकिन दिसंबर 2021 में एक फोन कॉल ने चौंका दिया—पता चला कि प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल में ‘सुनील अदे’ के नाम से बंद हैं।
प्रशासन की पहल और वाघा बॉर्डर पर रिहाई
Balaghat 31 जनवरी को पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए सात भारतीयों में प्रसन्नजीत का नाम भी शामिल था। अटारी-वाघा बॉर्डर पर उन्हें बीएसएफ के सुपुर्द किया गया। चूँकि परिवार आर्थिक रूप से कमजोर था, इसलिए बालाघाट कलेक्टर मृणाल मीना ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए विशेष टीम गठित की और उन्हें अमृतसर से बालाघाट लाने की व्यवस्था की। शुक्रवार शाम जब प्रसन्नजीत अपनी बहन के घर महकेपार पहुंचे, तो पूरे गाँव में खुशी और भावुकता का माहौल छा गया।
जेल की आपबीती और भविष्य की चिंता
Balaghat सात साल पाकिस्तान की जेल में बिताने के बाद प्रसन्नजीत की मानसिक स्थिति अभी भी नाजुक है। उन्होंने बताया कि जेल में उन्हें सुबह 7 बजे जगा दिया जाता था और उनसे बगीचे की सफाई जैसा श्रम कराया जाता था। वर्षों बाद घर लौटे बेटे को देखकर पिता और बहन की आँखों में आँसू थम नहीं रहे हैं। अब परिवार ने सरकार से गुहार लगाई है कि प्रसन्नजीत के बेहतर मानसिक उपचार की व्यवस्था की जाए ताकि वह अपनी खोई हुई जिंदगी को दोबारा पटरी पर ला सकें।





