करुर TVK की रैली: भगदड़ में मृतकों की संख्या 40 तक पहुंची
BY: VIJAY NANDAN
तमिलनाडु के करूर जिले में अभिनेता-राजनीतिज्ञ विजय थलापति की रैली में शनिवार को भारी भीड़ के बीच भगदड़ मच गई। हादसे में अब तक 39 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 50 से अधिक लोग घायल हुए हैं। घायलों में कई की हालत गंभीर बताई जा रही है। इस हादसे के बाद साउथ की राजनीति में अभिनेताओं की एंट्री से कई सवाल खड़े हो रहे हैं। पहला सवाल ये कि दक्षिण फिल्मों के अभिनेताओं को नेतागिरी के पर्दे पर अभिनय करने का मौका इतनी आसानी से कैसे मिल जाता है। जो क्रेज फिल्मों रहता है वही क्रेज उनका राजनीति में भी दिखाई क्यों देता है। अभिनेता को लोग भगवान क्यों मानते हैं। ऐसा तमाम सवाल हैं जिनके जवाब इस लेख में हमने तलाशने की कोशिश की है।
मुआवजा और सहायता
राज्य सरकार ने मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की है। अभिनेता से नेता बने विजय थलापति ने भी अपने स्तर पर मृतकों के परिवारों को 20-20 लाख की वित्तीय सहायता और घायलों के उपचार का खर्च उठाने का ऐलान किया है।

जांच और कार्रवाई
पुलिस ने आयोजन से जुड़े लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। घटना की गहन जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित किया गया है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक रैली में अनुमति से कहीं ज्यादा लोग पहुंचे थे और पर्याप्त निकासी मार्ग न होने के कारण हालात बिगड़ गए।
भीड़ प्रबंधन पर सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि कार्यक्रम तय समय से देरी से शुरू हुआ, जिससे भीड़ और ज्यादा बेचैन हो गई। सुरक्षा व भीड़ नियंत्रण के इंतज़ाम पर्याप्त नहीं थे, जिसके चलते भगदड़ जैसी स्थिति बनी।
नेताओं और कलाकारों की प्रतिक्रिया
घटना के बाद तमिलनाडु के राजनीतिक दलों व फिल्मी जगत के कलाकारों ने मृतकों के प्रति संवेदना जताई है और सुरक्षित आयोजन की अपील की है।
लोगों में ऐसी दीवानगी क्यों? दक्षिण के सितारों को ‘भगवान’ क्यों मानते हैं फैंस ?
दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में सितारों के लिए दर्शकों का प्यार सिर्फ़ पर्दे तक सीमित नहीं है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में फ़िल्मी हस्तियों को देवता जैसा दर्जा मिलता है। रजनीकांत, चिरंजीवी, विजय थलापति, एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर), जयललिता, एन.टी. रामाराव, कमल हासन और पवन कल्याण जैसे नाम इसके बड़े उदाहरण हैं।
फैंस की दीवानगी के पीछे वजह
दक्षिण भारत में सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुभव है। यहां के लोग धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के प्रति जितनी श्रद्धा दिखाते हैं, उतनी ही निष्ठा अपने पसंदीदा सितारों के प्रति भी रखते हैं। जब यही स्टार्स राजनीतिक मंच पर आते हैं, तो उनका प्रभाव और बढ़ जाता है।
जुनून से जन्म लेते हैं हादसे
विजय थलापति की रैलियों या फिल्मों के कार्यक्रमों में उमड़ी भीड़ कई बार भगदड़ का कारण बन चुकी है। हैदराबाद में अल्लू अर्जुन के एक इवेंट, केरल में दुलकर सलमान के शो और तेलंगाना में जूनियर एनटीआर के म्यूजिक लॉन्च पर भी ऐसी ही घटनाएं हुईं। भीड़ का यह समुद्र कभी-कभी त्रासदी का रूप ले लेता है।
रजनीकांत और राजनीति
‘थलैवा’ रजनीकांत को उनके प्रशंसक देवता की तरह पूजते हैं। राजनीतिक दल भी चुनाव के समय उनका समर्थन पाने की कोशिश करते हैं। उनके फैन क्लब ने ही कई नेताओं को बेचैन कर दिया था।

एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर)
तमिल फिल्मों के सुपरस्टार एमजीआर ने 1972 में खुद की पार्टी बनाई और पांच साल में ही मुख्यमंत्री बने। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि 1987 में उनकी मौत पर हिंसा और भीड़ के चलते कई लोगों की जान चली गई।

एन.टी. रामाराव (एनटीआर)
तेलुगु फिल्मों के दिग्गज एनटीआर ने भगवान राम और श्रीकृष्ण के किरदार निभाकर दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई। 1982 में उन्होंने तेलुगु देशम पार्टी बनाई और तीन बार आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

जयललिता – ‘अम्मा’ की छवि
एमजीआर की करीबी जयललिता ने फिल्मों से राजनीति में कदम रखा और 1991 से 2016 तक पांच बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं। उनके निधन के बाद हजारों प्रशंसक शोक में डूब गए थे।

चिरंजीवी और पवन कल्याण
तेलुगु सिनेमा के सुपरस्टार चिरंजीवी ने प्रजा राज्यम पार्टी बनाई, बाद में कांग्रेस में विलय कर लिया। उनके छोटे भाई पवन कल्याण ने 2014 में जन सेना पार्टी बनाई, जो अभी भी सक्रिय है।

कमल हासन
सुपरस्टार कमल हासन ने 2018 में एमएनएम पार्टी बनाई और भ्रष्टाचार व परिवारवाद के खिलाफ राजनीतिक विकल्प देने की कोशिश की।
सांस्कृतिक जुड़ाव और परंपराएं
फिल्म विश्लेषकों के अनुसार, दक्षिण भारतीय फिल्मों में स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं, भाषा और जीवनशैली को सम्मान के साथ पेश किया जाता है। यही कारण है कि अभिनेता जनता के दिलों में ‘देवतुल्य’ स्थान पा जाते हैं।





