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कौन थे वो महात्मा जिनके आगे प्रधानमंत्री भी नतमस्तक हुए?

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BY: Yoganand Shrivastva

सरयू नदी के किनारे एक साधारण-सी मचान पर विराजमान एक दुबले-पतले वृद्ध योगी, जिनका शरीर वस्त्रहीन, जटाएं लंबी और आंखों में ऐसी गहराई मानो सारी सृष्टि को पढ़ सकती हों। लोग उन्हें देवता मानते थे, तो कोई उन्हें सिद्ध योगी कहता था। लेकिन उनका परिचय किसी पद, प्रचार या पहचान का मोहताज नहीं था। नाम था — देवरहा बाबा। एक ऐसे योगी जो न तो किसी पद पर रहे, न ही कभी राजनैतिक मंच पर भाषण दिए, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर इंदिरा गांधी, नेहरू, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव और मदन मोहन मालवीय जैसे लोग उनके चरणों में आशीर्वाद लेने पहुंचे।

देवरहा बाबा का जन्म और रहस्यमय जीवन

देवरहा बाबा के जन्म स्थान और तिथि को लेकर आज तक कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं मिला है। हालांकि ऐसा माना जाता है कि वे देवरिया जिले के नाथ नदौली गांव में पैदा हुए थे और उन्होंने लगभग 250 वर्षों तक धरती पर जीवन व्यतीत किया। कई लोग दावा करते हैं कि वे 500 वर्षों तक जीवित रहे। उनकी उम्र, जन्म की तारीख और असली पहचान रहस्य ही रह गए।

उनका निवास कभी स्थायी नहीं रहा। वे ज्यादातर समय सरयू नदी किनारे या मथुरा के यमुना घाट पर लकड़ी की मचान पर ध्यान-साधना में लीन रहते थे। उनका जीवन पूरी तरह तप, ब्रह्मचर्य और योग को समर्पित था।

मचान वाला संत: जिसकी झलक भर के लिए जुटती थी भीड़

देवरहा बाबा 12 फीट ऊंचे लकड़ी के मचान पर रहते थे। नीचे केवल तब उतरते थे जब उन्हें सरयू नदी में स्नान करना होता था। उनके दिनचर्या में कोई भौतिक आकर्षण नहीं था। शहद, दूध और श्रीफल का रस ही उनका आहार था। वे कहते थे – “भोजन केवल शरीर चलाने के लिए होना चाहिए, रस लेने के लिए नहीं।”

अद्भुत चमत्कारों की जीवंत गाथाएं

देवरहा बाबा के बारे में कई ऐसे चमत्कारी किस्से हैं जो आज भी सुनने वालों को अचंभित कर देते हैं:

  1. बाढ़ रोकने की शक्ति: सरयू की बाढ़ जब उनके मचान तक पहुंचती तो कुछ क्षण ठहर कर लौट जाती थी। लोग इसे उनकी चमत्कारी शक्ति मानते थे।
  2. जानवरों से संवाद: कहा जाता है कि वे पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे। जंगली जानवर तक उनके पास बैठ जाते थे जैसे वो उनके अपने हों।
  3. जल समाधि: मथुरा के यमुना नदी में उन्होंने कई बार आधे घंटे तक बिना सांस लिए जल समाधि ली थी। ये चमत्कार उन्होंने हजारों लोगों की उपस्थिति में किए।

राजनेताओं के गुरू

देवरहा बाबा के अनुयायियों में केवल आमजन नहीं, देश की सबसे बड़ी राजनीतिक हस्तियां भी थीं:

  • जवाहरलाल नेहरू: भारत के पहले प्रधानमंत्री भी उनके दर्शन करने पहुंचे थे।
  • इंदिरा गांधी: आपातकाल के बाद चुनाव हारने पर इंदिरा गांधी ने देवरहा बाबा से आशीर्वाद लिया था। बाबा ने हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। यही हाथ चुनाव चिन्ह “हाथ” का प्रतीक बन गया और 1980 में इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में लौटीं।
  • अटल बिहारी वाजपेयी: उन्होंने देवरहा बाबा को भारतीय अध्यात्म का प्रतीक बताया और अक्सर उनके आशीर्वाद के लिए मथुरा जाया करते थे।
  • मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राजीव गांधी और अन्य मंत्रीगण भी उनके शिष्य रहे।

सत्य और सिद्धांत के प्रतीक

देवरहा बाबा कभी किसी राजनीतिक पार्टी के पक्षधर नहीं बने। उन्होंने सिर्फ धर्म, नीति, योग और सेवा का मार्ग दिखाया। उनका संदेश था — “जो मन से शुद्ध है, वही ब्रह्म के निकट है।” उन्होंने कभी धन, वैभव या प्रचार को तवज्जो नहीं दी।

राम मंदिर आंदोलन और भविष्यवाणी

1989 के प्रयागराज कुंभ मेले में देवरहा बाबा ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की भविष्यवाणी की थी। उनके निर्देश पर ही 9 नवंबर 1989 को शिलान्यास की तारीख तय हुई थी। विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं को उन्होंने यही कहा था — “राम का काम रुकेगा नहीं, चाहे कितनी बाधाएं आएं।”

प्रयागराज का कल्पवास और महाकुंभ में दीक्षा

हर माघ महीने में देवरहा बाबा प्रयागराज में कल्पवास करते थे। उनका मचान वहां भी गंगा-यमुना संगम के पास लगता था। यहां बाबा लोगों को ध्यान, त्राटक, प्राणायाम, और लय योग की दीक्षा देते थे। उनकी साधना इतनी प्रबल थी कि हजारों की भीड़ में भी वे हर शिष्य को पहचान लेते थे।

उनकी मृत्यु या महाप्रयाण

19 जून 1990 को देवरहा बाबा ब्रह्मलीन हो गए। उनके ब्रह्मलीन होने की खबर ने पूरे देश में शोक की लहर दौड़ा दी थी। हालांकि उनके अनुयायियों का मानना है कि बाबा केवल देह त्याग कर अनंत में विलीन हुए हैं — वो कहीं न कहीं अब भी विराजमान हैं।

समाधि स्थल और वर्तमान आश्रम

देवरिया जिले से करीब 35 किलोमीटर दूर देवसिया गांव में सरयू किनारे उनका समाधि स्थल और भव्य आश्रम स्थित है। इस आश्रम का पुनर्निर्माण और नवीनीकरण किया जा रहा है। यहां हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

क्या देवरहा बाबा फिर लौटेंगे?

बाबा के कई अनुयायी यह मानते हैं कि वो पुनः अवतार लेंगे। क्योंकि ऐसे योगी बार-बार नहीं आते। उनकी शिक्षाएं, तपस्या, ध्यान और उपदेश आज भी हजारों योगियों और साधकों के लिए पथ-प्रदर्शक हैं।

निष्कर्ष: संतों की परंपरा में एक अमर अध्याय

देवरहा बाबा भारतीय अध्यात्म की उस धारा का हिस्सा थे जिसमें तप, सेवा और योग की त्रिवेणी प्रवाहित होती है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा योगी न तो दिखावे में विश्वास करता है और न ही सत्ता से जुड़ता है, बल्कि वह सृष्टि की चेतना से जुड़ता है। देवरहा बाबा न केवल एक संत थे, बल्कि वो एक युग थे। एक ऐसा युग, जिसकी गूंज आज भी भारत के हर उस व्यक्ति के मन में सुनाई देती है जो आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ना चाहता है।

दंडवत प्रणाम उस दिव्य आत्मा को, जिसकी दृष्टि में पशु-पक्षी, राजा-रंक सभी समान थे और जिनके आशीर्वाद से प्रधानमंत्री तक दिशा पाते थे।

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